इश्क़ में क्या बतायें कि दोनों किस क़दर चोट खाये हुए हैं-जानीबाबू क़व्वाल

किसी सूफ़ी फ़क़ीर की लिखी ग़ज़ल लगती है मुझे। आत्मा की प्यास है की वह अपने घर वापस लौटना चाहती है ताकि फिरसे शरीर धारण नहीं करना पड़े। और शरीर को संसार से सुख इतना मिल रहा है कि मौत से बचने के उपाय भी निकाल लिए हैं और एकदम निश्चिंत होकर संसार को भोगने में लगा है। ठीक भी है लेकिन जब भी इस बात का एहसास हो की कितना हाई कुछ कर लो अंदर का ख़ालीपन है कि भरने का नाम हाई नहीं लेता, तब तो कम से कम इस बात का एहसास हो कि वही काम अलग अलग नाम से या तरीक़े से बार बार किया जा रहा है नहीं तो कुछ करने से परिणाम तो बदले। यदि इतना भी ख़्याल आ जाए तो आगे यह याद तो आत्मा ही दिला देती है कि बाहर से नहीं तो शायद अंदर की यात्रा पर एक बार कुछ दूर निकल कर देखें । तब इस सूफ़ी फ़क़ीर के शब्द आत्मा को झँझोड़ने में कामयाब होंगे।

इश्क़ में क्या बतायें कि दोनों  (मन और आत्मा)  किस क़दर चोट खाये हुए हैं मौत ने मन मारा है  (मौत हमेशा मन/egoकी होती है) और हम। (आत्मा)। ज़िंदगी के सताये हुए हैं। (संसार के माया जाल मे उलझकर आत्मा को आदमी भूल ही जाता है) 

वो ज़माना हुआ पहली शब को,(आत्मज्ञान होते ही व्यक्ति के सारे गुनाह माफ़ उसी तरह हो जाते हैं जैसे रमज़ान की २१ वीं रात या पहले शब को नमाज़से होते हैं)। एक सुहागन की मैय्यत (बुद्धा/आत्मज्ञानी हुआ था कोई)  उठी थी| आज तक लोग ज़हनों में अपने, चूड़ियाँ (उसक़े संदेश) खनखनाये (गुनगुनाएB) हुए हैं।

ऐ लहद (शरीर) अपनी मिट्टी (इंद्रियों) से कह दे दाग लगने न पाये क़फ़न को (लाश अब उनसे बेअसर रहे)। आज ही हमने बदले हैं कपड़े (मन को मार कर आत्मा के साथ एक हो गए हैं, संसार में कमल के पत्ते की तरह रहेंगे अब) । आज ही हम नहाये (बुद्धा होकर आत्मज्ञान से) हुए हैं

अब हम तो फ़कत एक ऐसी। चलती फ़िरती हुई लाश रह गए (यहाँ लाश मतलब egoless body को लाश की तरह, egolessness में ही आत्मज्ञान होता है)  जिसकी मैयत में हद है के हम ख़ुद। अपना कंधा लगाये हुए हैं

मेहंदी हाथों में होठों पे लाली । माँग में अफशां है सुर्ख़ जोड़ा (जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है तो बस लाल रंग रह जाता है यह उसका प्रतीक है फ़िर मन हमेशा के लिए मर जाता है)। ऐसे आये हैं मैय्यत में मन की, के जैसे शादी में आये हुए है

ओशो द्वारा सुझाया और मेरे द्वारा प्रयोग लाकर अद्भुत पाया गया  सहज ध्यान यानी होंश पूर्वक जीना यानी रोज़ के काम में होंश का प्रयोग मेरे जीवन को बदलकर रख गया। अपने आप सहज ही मन सपने देखना कम कर देता है, फिर जब भी सपना शुरू करता है तो विवेकपूर्वक उसका आना दिखाई देने लगता है, और दिखाई दे गया कि फिर बुना नया सपना मन ने-तो फिर रोकना कोई कठिन काम नहीं है। मैंने इसे ओशो की एक किताब से सीखा और जीवन में सुबह ब्रश करते समय प्रयोग करके साधा।इसे आप मेरे अंग्रेज़ी के पोस्ट ‘Awareness as meditation’ पर जाकर पढ़ सकते हैं। 

नमस्कार ….. मैं अपनी साक्षी की साधना के व्यक्तिगत अनुभवों से अपनी टिप्पणियाँ लिखता हूँ। इस पोस्ट में दुनिया भरके रहस्यवादियों की शिक्षाएँ शामिल हो सकती हैं जिन्हें मैं अपने अनुभव से तौलकर आज भी मानने लायक समझता हूँ। अधिकजानकारी के लिए और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ने के लिए वेबसाइट https://linktr.ee/Joshuto पर एक नज़र डालें, या मेरे यूट्यूब चैनल या पॉडकास्ट आदि सुनें।

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