इहि तत्त कहियो ज्ञानी

कबीर ने कहा है:

जल में घड़ा हैघड़े में जल है बाहर भीतर पानी।

फूटा घड़ा, जल जल ही समाना, इहि तत्त कहियो ज्ञानी ॥

मनुष्य के शरीर को घड़े की संज्ञा दी गयी है । जैसा अनंत विस्तार ब्रह्म का शरीर से बाहर दिखाई देता है, आत्मज्ञानी को प्रत्यक्ष ‘दर्शन’ के समय ठीक वैसा ही अनंत विस्तार अपने अंदर दिखाई देता है। 

इस अनुभव के बाद एक ऐसा समय आता है जब आध्यात्मिक यात्रा में व्यक्ति को भीतर और बाहर ब्रह्म काअनुभव एक साथ होता है और उसका अहंकार सदा के लिए विलुप्त हो जाता है जैसे वह कभी था ही नहीं। इसीअवस्था को कबीर ने तत्त या तत्व के नाम से पुकारा है जो व्यक्ति को अपनी वास्तविकता से परिचय कराताहै। और फिर आत्मज्ञानी व्यक्ति को सबमें वही तत्व के दर्शन होने लगते हैं। 

उसके  शरीर और संसार के बीच जो भेद था वह समाप्त हो जाता है। उसे दोनों ही में उसी एक की प्रतिध्वनि सुनाई देने लगती है. 
ऐसा है यह अनुभव जैसे कि दसों दिशाओं से अनंत इस जगह आकार उस आकार में differect होने लगा है, बाक़ी वहाँ कुछ है ही नहीं जिसे हम शरीर कहें। और ऐसा ही सभी वस्तुओं के साथ भी हो रहा है।