हर शरीर में रामायण या महाभारत घट रही है प्रतिक्षण।

मनुष्य/पुरुष के भीतर पाँच शरीर होते हैं, सबसे ऊपर स्थूल शरीर इसे महाभारत में भीम का नाम दिया है. फिर इसके भीतर प्राण शरीर(aura) इसे नकुल का नाम दिया। फिर इसके भीतर मानस शरीर इसे सहदेव का नाम दिया। फिर इसके भीतर विज्ञान शरीर, इसे अर्जुनका नाम दिया ये सब रूप (shape) से आबद्ध हैं और अंत में आत्मा जो युधिष्ठिर के नाम से जानी गयी और परमात्मा कृष्ण। इसीलिएसिर्फ़ युधिष्ठिर पहुँचे स्वर्ग! और संवाद सिर्फ़ रूप से हो सकता है। इसलिए अर्जुन से। और जो जितना भीतर का शरीर है अपने से ऊपरके शरीरों को नियंत्रित करता है। तो हर स्त्री द्रोपदि के ही समान पाँच पतियों की पत्नी होती है और वे पाँचों  व्यवहार हर व्यक्ति प्रदर्शितकरता है. 

नकुल और सहदेव जुड़वाँ भाई हैं क्योंकि मन और प्राण जुड़े हैं। मौत मन की होती है और प्राण निकल जाते हैं इच्छाओं को साथ लेकर।और उन्हीं मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए यह शरीर धारण किया है पूर्व के शरीर के प्राण ने इसलिए उनके पिता भी जुड़वाँ हुए की नहीं? अर्जुन हमारे भीतर प्रज्ञा का प्रतीक है जो  जाग्रत हो तो मन को शून्य करके प्राण को सहस्त्रार में स्थापित करदे और इस प्रकार शरीर सेअलग होकर (कर्ता में अकर्ता और अकर्ता में कर्ता जानकर) खुद आत्मा के साथ होकर परमात्मा का दर्शन कर ले। 

कौरव हमारी हज़ार इच्छाओं का, हमारे धार्मिक संस्कार का, सामाजिक सम्मान का, हमारे धन और ताक़त का और कुल (bloodline) का प्रतीक हैं जो इच्छाओं के साथ इकट्ठी होकर 16,000 या 16लाख की संख्या तक हमारे संसार या शरीर से लगाव का प्रतीक हैं। जोशिक्षा हमने पायी है, उससे लगाव को गुरु द्रोणाचार्य के रूप में बताया है।

लेकिन परमात्मा, जिसे कृष्ण के रूप में बताया गया है, हमें तभी मिलेगा जब हम इनको त्यागने का प्रयत्न ना करके पहले healing द्वाराअपने व्यक्तित्व से बचपन के घाव इत्यादि को एंकाउंटर group, Primal Therapy और Gestalt Therapy द्वारा समझने का प्रयत्न करेंऔर उनको स्वीकारें जो कमियाँ सामने दिखाई  दे रहीं हैं। ओशो का मानना है कि स्वीकारने से ही ये कमियाँ अपनेआप धीरे धीरे लुप्त होजातीं हैं। 

महाभारत के समय जीवन इतना व्यस्त और polluted नहीं था। सूचनात्मक रूप से इसलिए  इन कामनाओं और conditioning से  लड़कर उन्हें समाप्त किया जा सकता होगा। लेकिन आज के समय में उनसे सीधे लड़ना सम्भव नहीं है। 

इन तीनों Therapy का सार यह है कि ready to Learn,Unlearn and Relearn.

   क्या व्यक्ति सीखने को तैयार है? अपनी शिक्षा, धर्म, समाज, कुल, भाषा, रूप, रंग, राष्ट्र और अहंकार के साथ बहुत जुड़ाव रखता है तोफिर वह सीखने को अभी तैयार नहीं है। पूरा ख़ाली होकर ही कुछ सीखा जा सकता है अन्यथा जो भी बताया जाएगा उसको वह अपनेऊपर बताए ज्ञान के साथ compare करेगा और यदि उससे मेल खाता होगा तो करेगा, और यदि मेल नहीं खाएगा तो कितना भी ज़रूरीहो उसकी आगे की यात्रा के लिए वह पूरे मन तो नहीं करेगा यदि करना ज़रूरी ही हो जाए। बस वह वहीं अटक गया, और दोष वह दूसरोंपर लगाएगा।

 २. फिर यदि सीखने को तैयार है तो जब समझ में आ जाए कि अबतक के जीवन में आसपास की परिस्थितियों के कारण कुछ ऐसासीख लिया गया है जो दुनिया में धन कमाने इत्यादि के लिए ज़रूरी था लेकिन अब आध्यात्मिक यात्रा में वही अड़चन बन सकता है, तोउसको छोड़ने के लिए तैयार हो जाए। 

३.और जो आगे कि आध्यात्मिक यात्रा के लिए ज़रूरी हो उसे किसी से भी सीखने के लिए तैय्यार हो। उसके लिए आगे की यात्रा औरउसमें पूरी निष्ठा के साथ प्रयत्न करना महत्वपूर्ण हो ना कि उम्र, लिंग, राष्ट्रीयता, जाती इत्यादि ।

 यदि यह सब कोई खुद से करने को तैयार हो तो उसे Therapy से गुजरने की ज़रूरत ही नहीं है।   ओशो की किताबों में उन्होंने जगहजगह प्रयोग दे रखे हैं। मैंने तो उन्हें बड़ी निष्ठा से अपनाया और परिवार भी चलता रहा। सांसारिक यात्रा और आध्यात्मिक यात्रा साथसाथ। और आध्यात्मिक यात्रा का कभी किसी को बखान भी नहीं किया, सबको मैं एक साधारण धार्मिक आदमी लगता रहा। 

   लेकिन इन सबके होते हुए meditation करना ज़्यादा हानिकारक हो सकता है। विशेषकर कोई जीवित ओशो या enlightened master का साथ नहीं हो। 

अतः therapy के बाद या therapy का साथ साथ meditation करके जिसके दर्शन होंगे या खुद की चुपचाप यात्रा से जिसके दर्शन होंगेवह कृष्ण नहीं होंगे (क्योंकि कृष्ण तो महाभारत के एक पात्र का नाम हैं जो तुम्हारे भीतर चल रही है), जैसे तुम एक पात्र(शरीर) का नामहो जो उस आत्मा (अर्जुन)ने धारण किया है। 

तो दर्शन तुम्हें अनंत परमात्मा के होंगे, अपने स्वरूप के होंगे, जो तुम हो। जो जन्म से लेकर आज तक सब देखता रहा है। उसे ही यादरहता है कि बचपन कैसा था, और जवानी कैसे कट गयी, और आज अधेड़ अवस्था है। वही तुम्हारा स्वरूप ढूँढता है और याद दिलाने कीकोशिश करता है जब तुम दिमाग़ में कुछ भूली हुई बात ढूँढते हो।

यदि कृष्ण के दर्शन हों तो मुसलमान सूफ़ियों ने किसको पाया? बुद्ध ने किसके दर्शन किए? इसलिए रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों सेआध्यात्मिक यात्रा करके जाना कि सभी यात्राओं से वही एक के दर्शन होते हैं, जो हमारा स्वरूप ही है. 

इन पुराणिक कहानियों को बच्चों से बड़ों तक सबकी रग रग में समा देने के पीछे उद्देश्य ही यही था कि कभी इनमें से कोई आध्यात्मिकयात्रा पर निकले और पहुँच जाए तो उसके आगे की यात्रा की hint इनमें दे रखी है। क्योंकि enlightenment उस यात्रा का पहला पड़ावहै, अंतिम पड़ाव निर्वाण ही है। जिसके बाद ही मनुष्य अपना शरीर अपनी इच्छा से छोड़ सकता है। और तभी पुनर्जन्म भी नहीं होगा।मोक्ष तक की यात्रा के hint उसी प्रकार दे रखे हैं जैसे Zen में Koan (पहेलियों) को सुलझाना होता है। हमारे लिए रामायण के पात्रोंऔर महाभारत के पात्रों का शरीर के भीतर से मेल बिठाना ही हमारे लिए पहेली है। लेकिन यह ज़्यादा आसान है, क्योंकि पूरी याद है।

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