जो कर्ता में अकर्ता, और अकर्ता में कर्ता को देखता है – २

मेरे बगीचे के तोतापारी आम के पेड़ पर बरसात की बूँदों के साथ फोटो जो कर्ता में अकर्ता को स्पष्ट करने के लिए इसका प्रयोग में लिया है।
जो कर्ता में अकर्ता को देखता है वही समझ सकता है कि पेड़ पर पानी की बूँदें बादल ने नहीं गिराई हैं, क्योंकि कई बार बादल बिना बरसे भी चले जाते हैं। प्रकृति या ईश्वर इसमें कर्ता है।

कृष्ण के गीता में कहे वाक्य ‘जो कर्ता में अकर्ता और अकर्ता में कर्ता को देखता है, वही देखता है।’ को मेरे पिछले पोस्ट में मैंने अंधे और लंगड़े की कहानी से समझाने का प्रयत्न किया था और एक प्रयोग सुझाया था। कृपया पहले उसे ज़रूर पढ़ लेवें।

उसी को यहाँ विस्तार से दूसरे उदाहरणों से अधिक स्पष्ट करने के प्रयत्न किया है। 

आत्मा अकर्ता है, जब चलने की बात आये। आत्मा चल नहीं सकती, वह सिर्फ़ देख सकती है। और कर्ता है जब देखने की बात आए।आत्मा स्थिर है इसलिए जब वह देख रही थी जब आप छोटे थे, और जब आप बड़े हुए तब उसने दोनों के अंतर को भी देखा। इसलिए आपको बचपन से लेकर अभी तक इतना बदलाव आने पर भी आपको यह नहीं लगता कि आप वह नहीं हैं जो बचपन में थे। और शरीर कर्ता है सांसारिक कार्य का, लेकिनअकर्ता है जब देखने की बात आए। अपने को देखने के लिए उसे काँच या किसी और का सहारा लेना होता है। 

तो इस प्रकार शरीर हमारा स्वरूप नहीं है क्योंकि यह तो  मृत्यु के साथ ही ख़त्म हो जाएगा। हमारा स्वरूप आत्मा है, और आत्मा कोजानना ही अपनेआप को जानना है, और आत्मा को उसमें खोकर ही जाना जा सकता है तो आत्मा को जानना ही परमात्मा हो जाना भीहै। 

तभी उदघोश निकलेगा अपनेआप से ‘अहं ब्रह्मस्मि’। वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है जिससे यह उदघोश अपने आप निकला हो।किसी के कहने से नहीं, किसी से सुनने से नहीं। 

कबीर इसी को कह गए है: 

कहा सुनी की है नहीं, देखा देखी की है बात। 

आत्मा में dissolve हो जाना, खो जाना ही आत्मा को देखना है। काम के समय भी हम अपने आप में खो जाते हैं, वहाँ इसकी झलकहमको मिली ज़रूर है लेकिन तब काम का सहारा लेकर खोए थे। और जो सबका सहारा है उसे बेसहारा होकर ही जाना जा सकता है। 

इसीलिए संगीतज्ञ भी ईश्वर के प्यासे रहते हैं। सहारे से एहसास होता है लेकिन डूब नहीं पाते। तिनके का भी सहारा है तो डूब नहींपाओगे। और उसे डूबकर पूरी तरह dissolve होकर ही जाना जा सकता है। 

ऊपर से तुर्रा यह कीं समय बहुत काम है। कबीर ने कहा है: सागर में एक लहर उठी, फिर गिरकर सागर में हो मिल गयी। सिर्फ़ इसलिएकि उसका नाम ‘लहर’ है, क्या वह सागर नहीं रही? लेकिन खुद को लहर मानते ही सारा मायाजाल अपनेआप गुँथने लगता है। फिर उसमें भेद करना शुरू कर देता है mind जैसे कोई सुनामी लहर, ज्वार-भाटा लहर, छोटी लहर, नीची जाति की लहर, बनिया लहर, ब्राह्मण लहर, शूद्र लहर, क्षत्रिय लहर, Indian लहर, पाकिस्तानी लहर, मुसलमान लहर, Christian लहर, बौद्ध लहर, गोरी लहर, काली लहर, Asian लहर, engineer लहर, डाक्टर लहर, डॉक्टरेट लहर, scientist लहर, richest लहर, poor लहर, भिखारी लहर, दानदाता लहर, प्रधानमंत्री लहर, कोंग्रेस लहर, dictator लहर, लिबरल लहर, पुरुष लहर, स्त्री लहर, हिजड़ा लहर, lesbian लहर, ग्रीन लहर, sea facing लहर, highrise लहर, झोंपड़पट्टी लहर, किसान लहर, मज़दूर लहर, अखाड़ा लहर, निर्गुणी लहर और वोटर लहर, NOTA लहर और फिर उनमें भी हज़ार तरह के भेद। खुद का पता नहीं की वह लहर बनी है, एक मौक़ा मिला है सागर को जानने का- क्योंकि अलग होकर ही जाना जा सकता है-और इन भेदों में उलझकर मूल उद्देश्य तो बाक़ी ही रह गया और लहर वापस सागर में मिलकर सागर हो गयी लेकिन सतह पर प्लास्टिक की गंदगी के साथ ही गुज़ारा करना है अगला मौक़ा मिलने तक। बड़ा प्रयास किया था लहर रहते सागर की सफ़ाई का, असम्भव काम हाथ में ले लिया, और जो सम्भव था- कि खुद को जान लेती की लहर नहीं सागर है तो गहरे में चली जाती और हमेशा के लिए साफ़ ही रहती।

मनुष्य जीवन सागर में उठी लहर से ज़्यादा नहीं है। लेकिन challenge बहुत तगड़ा है की उससे पहले कि वह लहर गिरकर वापस समुद्रहो जाये, उसे खुद को यह जान लेना है कि वह समंदर ही है, जो नाम उसे दिया है वह सिर्फ़ सुगमता के लिए है, जो ओहदा उसने पाया हैवह सिर्फ़ उस दौरान उदर पूर्ति और परिवार के लिए है इत्यादि सब तुच्छ हैं कामचलाऊ हैं उनसे लगाव या उन बातों में उलझकर जो मुख्यउद्देश्य है लहर हो जाने का उसको नहीं भूलना है और urgent basis पर चाहे थोड़ा ही सही लेकिन करना है क्योंकि यह शुभ है, यहपुरुषार्थ का हिस्सा है और मृत्यु के बाद भी साथ रहता है। 

जो लहर यह जान लेती है और पा लेती है अपना उद्देश्य फिर वह सागर को गहराई में लुप्त हो जाती है। फिर लहर नहीं बनती।

इसी को रहीम ने कहा है: जिन खोज तीन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।

या तो मन को सागर समझो और विचारों को लहर तो जब मन पूरी तरह शांतहोगा तब पाओगे। या अपने आप को जान लोगे तब पाओगे। सागर और संदर तो बहना है, असली बात आपको जगाना है। यह बात आपतक पहुँची इसका मतलब ही है कि भोर हो गयी है आपके लिए, अब जागो। 

ओशो द्वारा सुझाया सहज ध्यान यानी होंश पूर्वक जीना यानी रोज़ के काम में होंश का प्रयोग मेरे जीवन को बदलकर रख गया। अपने आप सहज ही मन सपने देखना कम कर देता है, फिर जब भी सपना शुरू करता है तो विवेकपूर्वक उसका आना दिखाई देने लगता है, और दिखाई दे गया कि फिर बुना नया सपना मन ने-तो फिर रोकना कोई कठिन काम नहीं है। मैंने इसे ओशो की एक किताब से सीखा और जीवन में सुबह ब्रश करते समय प्रयोग करके साधा।

नमस्कार ….. मैं अपनी आंतरिक यात्रा में होंश के अपने जीवन में प्रयोग और उसके व्यक्तिगत अनुभवों से अपनी टिप्पणियाँ लिखता हूँ। इस पोस्ट में दुनिया भरके रहस्यवादियों की शिक्षाएँ शामिल हो सकती हैं जिन्हें मैं अपने अनुभव से तौलकर आज भी मानने लायक समझता हूँ। अधिकजानकारी के लिए और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ने के लिए, वेबसाइट https://linktr.ee/Joshuto पर एक नज़र डालें, या मेरे यूट्यूब चैनल  या पॉडकास्ट भी सुन सकते हैं। 

कॉपीराइट © ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन, अधिकतर प्रवचन की एक एमपी 3 ऑडियो फ़ाइल को osho डॉट कॉम से डाउनलोड किया जा सकता है या आप उपलब्ध पुस्तक को OSHO लाइब्रेरी में ऑनलाइन पढ़ सकते हैं।यू ट्यूब चैनल ‘ओशो इंटरनेशनल’ पर ऑडियो और वीडियो सभी भाषाओं में उपलब्ध है। OSHO की कई पुस्तकें Amazon पर भी उपलब्ध हैं।

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