घणा दिन सो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

इस देश के आध्यात्मिक यात्रा पर किए अनुसंधान इतने गहरे गए हैं कि कहीं और इस जगत में उसकी बराबरी नहीं है। सत्य हमेशा नएनए रूप में जगत के सामने आता रहेगा यह उसका स्वभाव है। यदि जिनके ऊपर इसके अनुसंधान की ज़िम्मेदारी है वे जब जब भी अपनीज़िम्मेदारी से च्युत होंगे, सत्य अपने को प्रकट कहीं और से करने लगेगा। इसीलिए पश्चिम में लोग आजकल ज़्यादा इसका अनुभव करपा रहे हैं और पूरब फ़ालतू की बातों में ही उलझा हुआ है। 

कोई भी संत अपने सभी पूर्व जन्म की यात्रा कर सकता है। कबीर ने सिर्फ़ इस जन्म और पिछले जन्म के सम्बंध में यह रचना की है। अबतो हमको पता है कि यहूदी लोग भी यह मानते हैं कि पिछले जन्म की मौत के समय व्यक्ति को अपनीं REALITY का पता चलता हैऔर साथ ही साथ उसका जीवन किन व्यर्थ की बातों में व्यतीत हो गया उसकी पूरी फ़िल्म कुछ ही पल में दिख जाती है। और तब उसकोपता चलता है कि उसकी जगह कोई दूसरा ही जीवन जी रहा था और वह तो वह पा ही नहीं सका जिसके लिए उसको मनुष्य जन्म मिलाथा। तब वह ईश्वर से वादा करता है कि अभी बार जब उसे मनुष्य जन्म मिलेगा तब वह इसमें भटकेगा नहीं और अपने आपको सबसेपहले जानने जा प्रयत्न करेगा। तो जब माँ का गर्भ उसे फिर मिलता है तब तो उसे अपनी सौगंध याद रहती है और फिर जब माता केगरभ में भी उसकी उदर पूर्ति होने लगती है तब फिर भूल या सो जाता है, फिर प्रसव के कष्ट गुज़रता है तब उसे फिर सौगंध याद आती है और उल्टा लटक कर जैसे ही पहली साँस लेता है भीतर फिर भूल जाता है. इस प्रकार पूरे जीवन जब जब कष्ट से गुजरता है ईश्वर को जो वचन दिया था ‘कि इस बार मनुष्य जन्म तूने फिर से देकर जो उपकार किया है, एक मौक़ा और दिया है जबकि मेरी कोई योग्यता ही नहीं थी क्योंकि हज़ारों जन्मों से क़सम तोड़ता ही रहा हूँ। तो इस मौक़े को जो मिला है अपने को जानने का, अपनी Reality को जानने का, ईश्वरत्व की खोज अपने भीतर करने का, ‘अहं ब्रह्मस्मि’ का उदघोश खुद के अनुभव से करने का’ इस क़सम को फिर फिर भूलता है और कष्ट के समय फिर याद आती है फिर भूल जाता है इस प्रकार जीवन पूरा भोग लेता है पर जागता नहीं तब ‘तेन त्यकतेन भुंजिथा’ अर्थात् जिन्होंने भोगा वही जान भीसकता है उसकी व्यर्थता को- या इस व्यर्थता की उसकी याद दिलाते हुए कबीर कहते है ‘अब तो’ या ‘अथातो भक्ति जिज्ञासा’ की तर्क पर जागने की याददिलाते है कि अभी भी मौक़ा बाक़ी है। जो भी इस दिशा में प्रयत्न करेगा वह पुराने शुभ करमों में जुड़ता जाएगा cumulative addition को ही भगीरथ प्रयत्न कहा है, और यही पुरुषार्थ की ख़ासियत है। तो जो भी बन सके कर जा। यही शुभ लाभ है जो घटता नहीं। मैंने कुछपद आख़री में जोड़े हैं।

प्रह्लाद टिपानिया का भजन जिस पर यह पोस्ट आधारित है

घणा दिन सो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

पहला सुत्यो मात गरभ में, उल्टा मुँह तू झूला

साँस पाकर रोते ही, क़सम दियो बिसराय।

जनम तेरा हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

घणा दिन हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

दूजा सुत्यो मात गोद में, दूध पिया मुसकाया,  

बुआ ने तेरा पोतड़ा सीला. और मल मूत्र तेरा धोया ।

बहन भाई तेरे लाड़ लड़ाएँ, झूला दिया बँधाए।

बँधाऊँ तेरा हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

घणा दिन हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

तीजा सुत्यो त्रिया सेज पे, गले में बैयां डाली।

मोह मद में फँसी गयो तू, भूलो जन्म कौर(सौगंध)

बियाह तेरा हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

घणा दिन हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

चिता को सोणो बाक़ी रई गयो, सब लियो है रे भोगी।

कहे कबीर अब जागण की रे, तू जाग मत मरे गँवार।

मरण तेरो होने को है रे, अब तू जाग मुसाफ़िर जाग।


चौथा सुत्यो माया जगत में, मद मन को भरमाय।

अनंत इच्छा पूरी करन को, चारों पहर लगाय।

लगन तो लगा ले रे, अब मत मरे गँवार,

घणा दिन सो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

घणा दिन हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

ध्यान तू करी ले रे, अहंकार तज़ी दे रे,

सुमिरन तू करी ले रे, मन को मारी दे रे,

हरी को भजी ले रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

घणा दिन हो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

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