अंधेरी रात, तूफ़ाने तलातुम, नाख़ुदा गाफ़िल।

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अंधेरी राततूफ़ाने तलातुमनाख़ुदा गाफ़िल।

यह आलम है तो फिर इस किश्ती सरे मौजें रवाँ कब तक?

अच्छा यक़ीन नहीं है, तो कश्ती डूबा के देख।

एक तू ही नाख़ुदा नहीं है ज़ालिम, ख़ुदा भी है॥

ओशो talks

मेरे जीवन यात्रा पर ये दो लाइनें बिलकुल सटीक बैठती हैं। 

और मैं कहूँ कि हम सभी के जीवन पर भी यह सटीक बैठती है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये। 

संसार की नाव में यात्रा तो सुरक्षित है क्योंकि नाव इस किनारे से बंधी है। लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा नदी की बीच धार तक ही जा सकतीहै। और  वहाँ यदि यह तूफ़ान में फँसे तो यह रस्सी जो सुरक्षा देती थी यही मौत का कारण बन जाती है। इसी को नाख़ुदा गाफ़िल कहाहै। 

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि मैंने मँझधार में जाकर किश्ती को छोड़ दिया और अपने ऊपर भरोसा रखा कि यदि हम ग़लत कदम नहीं उठाएँ तोहमको कोई सही जगह पहुँचने से नहीं रोक सकता। 

एक तो अपने को नदी की धारा के ऊपर तिरने देना है। यही है ख़ुदा के भरोसे अपने को छोड़ देना, जब गाफ़िल नाख़ुदा हो जाये। फ़ालतूहाथ पाँव मारकर शक्ति बर्बाद नहीं करना है। 

दूसरा जब भँवर में फँस जाएँ तो और तेज़ी से उसमें भीतर जाना है। तो सबसे नीचे गति शून्य है और वहाँ से पानी खुद आपको उससे बाहरफेंक देगा। 

कहने का मतलब है अपने हाथ अपनी मौत मरना है ना की गाफ़िल के हाथों। जो मौत को transform कर पाएगा उसी कि इसी ज़िंदगी मेंtransformation भी होगा। इसी को ओशो ने कहा है ‘मैं मृत्यु सिखाता हूँ’।

तो मैंने मँझधार में नाव से छलांग लगा दी, और यह भी मैंने पाया कि यह धारा ही आपको अपने आप उस पार पहुँचाने का काम भी करतीहै। इसी को ओशो ने कहा है कि जो भी प्रयत्न करेगा पाने का या पहुँचने का तो वह डूब जाएगा। 

पहुँचने पर उस पार जो पहला धन्यवाद दिया जाता है वह उस गाफ़िल नाख़ुदा को ही दिया जाता है। उसी के कारण तो छलांग लगाई थी! यह संसार, यह नाव और यह रस्सी ग़लत नहीं है, आपको निर्णय लेने पर मजबूर करने के लिए बिलकुल सही हैं, आप safe गेम खेलते हैं, या risk लेते हैं उसपर सारा खेल का सार निकलेगा। और जब तक रिस्क नहीं लेंगे यह खेल खेलते रहना पड़ेगा जन्मों जन्मों तक। 

जब आप अपने career के peak पर हैं, तभी आप मँझधार में हैं। मेरा एक पोस्ट है ‘Few dares to enter into zones of spirituality…’ जो इसी को और गहराई से समझाने का प्रयत्न है। 

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