जैसे पानी के युग युग से प्यासे को, जीभर के अमृत पिलाया


परिणय फ़िल्म का भजन जिसे मन्ना डे या मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया है। इस फ़िल्म को रजत कमल पुरस्कार मिला था। 

Movie/Album: Parinay परिणय (1974)
Music By: Jaidev
Lyrics By: Naqsh Layallpuri
Singer : Manna de (in this linked song sung by Sharma Bandhu)
गाने के lyrics में ओशो जोड़ा है, मूल lyrics का हिस्सा कोष्ठक में है।

YouTube पर जाकर xHqnYzQHn2g को type करेंगे तो मोहम्मद रफ़ी या मन्ना डे की आवाज़ में आपको परिणय फ़िल्म का वह भजन सुनने को मिल सकेगा। मैंने यहाँ लिंक embed किया था लेकिन आज उसे लिंक से यहाँ open नहीं किया जा सकता है। इसलिए यह जुगाड़ करना पड़ा।

इस भजन का इन्स्ट्रमेंटल वर्ज़न बहुत ही शानदार है। एयरटेल के विंक म्यूज़िक पर सुनने का लिंक embed किया है। YouTube पर भी है यही इन्स्ट्रमेंटल वर्ज़न

बचपन में मुझे गर्मी की छुट्टियाँ बिताने के लिये अपने गाँव जाना सबसे अच्छा लगता था। खेत पर, पहाड़ पर और पेड़ पर कब दिन बीत जाता पता नहीं चलता था। ऊपर से जब भूख लगे तब कभी जामुन, कभी खजूर, कभी विलायती इमली और कभी आम के पेड़ तक जाना होता था।

जंगली झड़ियों में berry’s तो आते जाते झूड़ लेते थे।

मज़ा और बढ़ जाता जब रामलीला की मंडली आइ हुई हो। लेकिन मुझे शर्मा बंधुओं का गाया यह भजन बचपन से बहुत पसंद है, और जब भी मेरे जीवन में कठिनाई आयी तो में धीरे से राम की शरण में चला जाता। गीता का पाठ भी मेरे लिए राम की शरण में जाने जैसा ही है। और मैं आज समझा इसका राज यह भजन का बचपन से गुनगुनाते रहना था।

शर्मा बंधु हमारे गाँव की तहसील के ही निवासी थे। चारों भाई मिलकर जो समा बंधते थे कि लोग बस रो पड़ते थे। आज you tube पर या Google पर लोग भूल ही गए हैं कि यह भजन उन्होंने सिर्फ़ इतनी बार गा दिया कि original फ़िल्म का भजन लोग भूल ही गए हैं।

आज इस भजन का original भजन सुना तो पता चला की मन्नाडे साहब ने इसे गया है इसको, परिणय फ़िल्म में।

जैसे जैसे मेरी आध्यात्मिक यात्रा एक एक पड़ाव पार करती है, वैसे वैसे इसके बोल के अर्थ भी मेरे लिए गहरे होते जाते हैं।

पिछले पड़ाव पर मेरे लिए राम का मतलब धनुर्धारी राम से हटकर नानक ने जिसे नाम कहा वह राम हो गया था। वह जो घट घट वासी हैं ना कि वह जो अयोध्या का वासी है। राम शब्द से aum की ध्वनि निकलती है जिसको लगातार भजने से अनहद नाद शरीर में शुरू हो जाता है। उसको ही नानक ने कहा ‘एक ओमकर सतनाम’। वही सत्य की मौलिक आवाज़ है जो घट घट में गूंज रही है, लेकिन हम संसार में व्यस्त हैं इसलिए सुनाई नहीं देती।

आज तो मैंने आख़िरी के दो para को एक ही करके गाया। हमारी हालत भी कोई युग युग से तपती मरुभूमि से कोई कम नहीं है, और उस पर पानी नहीं अमृत की बरसात होती है, यदि राम की शरण में गए हों तो।

एक बात और कहना चाहूँगा : इस भजन को अल्लाह की याद में किसी सूफ़ी फ़क़ीर ने ही लिखा है- अब नक़्श लयालपुरी हों या कोई और सूफ़ी फ़क़ीर उससे फ़र्क़ नहीं पड़ता है। कबीर हों यह बुद्ध या ओशो शब्दों का चयन बहुत समझदारी से किया जाता है ताकि सत्य के बहुत क़रीब तक पहुँचा जा सके और कोई साधारण व्यक्ति उसके मंतव्य तक नहीं पहुँच पाए। क्योंकि धर्म की दुकान चलाने वाले उसे उसे विक्रत या भ्रष्ट या बदलकर जो भविष्य के साधक हैं उनके लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं उसका दुरुपयोग कर सकते हैं। कारण है उसका क्योंकि इन लाइनों को ध्यान से पढ़ेंगे तो पता चलता है।

भटका हुआ मेरा मन था कोई, मिल ना रहा था सहारा
लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे मिल ना रहा हो किनारा
उस लड़खड़ाती हुई नाव को जो किसी ने किनारा दिखाया

इसलिए इस पोस्ट का heading भी उसी तरह से रखा है। अब सुनें शर्मा बंधुओं को, मेरे लिए ही गाने आते थे ऐसा आज भी लगता है।

जैसे सूरज की गर्मी से
जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है
मैं जबसे शरण तेरी आया, मेरे (राम) गुरु ओशो

भटका हुआ मेरा मन था कोई, मिल ना रहा था सहारा
लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे मिल ना रहा हो किनारा
उस लड़खड़ाती हुई नाव को जो किसी ने किनारा दिखाया
ऐसा ही सुख मेरे…

शीतल बने आग चंदन के जैसी, (राघव) ओशो कृपा हो जो तेरी
उजियाली पूनम की हो जाए रातें, जो थी अमावस अंधेरी
युग युग से प्यासी मरूभूमी ने जैसे सावन का संदेस पाया
ऐसा ही सुख मेरे…

जिस राह की मंज़िल तेरा मिलन हो, उस पर कदम मैं बढ़ाऊँ
फूलों में खारों में, पतझड़ बहारों में, मैं ना कभी डगमगाऊँ
पानी के प्यासे को (तकदीर)ओशो ने जैसे जी भर के अमृत पिलाया
ऐसा ही सुख मेरे…

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