With thanks to BBC, Olympic and Shahrukh

हम असत्य से सत्य की ओर बढ़ें, हम अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ें तभी मृत्यु से अमृत की ओर बढ़ सकेंगे। तत् त्वम असि ।

फ़ेसबुक पर BBC News हिंदी का एक पोस्ट बड़ा रोचक हो गया। उसके माध्यम से शायद और कुछ लोगों तक यह जानकारी पहुँचे इसलिए यह ब्लॉग पोस्ट।

उनको मेरे अनुभव से कुछ समझाने के लिए मैंने फ़ेस बुक पर एक दूसरा पोस्ट उनके साथ share किया comment में।

Facebook के ही दूसरे पोस्ट से उदाहरण लेकर मेरा विचार बताने का प्रयत्न किया है। यह व्यक्ति जिसने अपने आप को पदक से ज़्यादा समझा, यह Christian होते हुए भी हिंदू है, (हिंदू मतलब धर्म का ग्रैजूएट होने लिए कॉलेज में प्रवेश लेना) यह संसारी होकर भी साधु है। जैसे कबीर हुए। यह धर्म की यात्रा पर निकल चुका, चर्च से शिक्षा लेकर। हमारे यहाँ सिर्फ़ जैन धर्म ऐसे लोगों को भी नमस्कार करता है लेकिन वह भी सिर्फ़ अपने नमोकार मंत्र में। मंत्र के अनुसार कर्म नहीं करते। हमारे शहर मे highcourt के बाहर एक ट्रैफ़िक कोंस्टेबल ड्यूटी करता है। उसने अपने साधारण से कार्य को असाधारण बना लिया है। उसके कारण वह बड़ा प्रसिद्ध हुआ भी, लेकिन बहुत बाद में। मैं तो कई वर्षों पहले की बात कर रहा हूँ। एक बार मैं अपने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के साथ बाज़ार में था और मेरी नज़र उनपर पड़ी, शायद लंच का समय रहा होगा तो रोड से कुछ दूर साइड में दोस्त के साथ खड़े थे। मैं तुरंत अपने बच्चों को लेकर गया और बच्चों को कहा कि इनके आशीर्वाद लो, इन्होंने अपने काम तो असाधारण बना दिया है। अपने काम में जिसे लगाव होगा वही ऐसा करेगा। तुम भी काम को छोटा मत समझना, तुम उससे हमेशा बड़े हो और तुम्हारे कारण वह काम जाना जाए कि ऐसे करते हैं काम। वह साधु पुलिसकर्मी बड़ा आश्चर्य चकित हुआ ! यदि नमोकर मंत्र का सिर्फ़ जाप जैन नहीं करते बल्कि आचरण में भी लाते तो उसको कई लोग प्रणाम तो करते ही, लेकिन नहीं करते हैं। फिर जैन लोग कहते हैं, पश्चिम वाले हमको सिखाएँगे? निश्चित ही उनसे नहीं तो Japanese Zen master से तो सीखना भी पड़ेगा, यदि सत्य तुम छुपा सको तो सत्य तुमसे छोटा हो गया, और तुम बड़े। जबकि तुम्हारा जीवन 100 बरस और वह भी अब गया तब गया हो रखा है।

‘नमों लोए सव्वसाहूनम’-जो भी धर्म की यात्रा पर निकल चुके हैं लेकिन अभी संसारी हैं, उनको भी नमस्कार।

लेकिन हमको अपने शब्दों में समझना होगा उसको। और महावीर ने कहा यह पहला कदम लेना ही सबसे कठिन है, चीन के लाओ त्ज़ु ने कहा कि जिसने पहला कदम उठा लिया वह पहुँच ही चुका बस कुछ समय की ही बात है। जापानी zen साधु इसलिए अपने शिष्यों को भी उसी तरह झुककर प्रणाम करते हैं जैसे उसने किया है।

अब महावीर की शिक्षा हमने मंत्र तक ही सीमित कर दी, लेकिन सत्य कहीं रुका है वह जापान में प्रकट होकर विद्यमान है। धर्म को हमने विकृत रूप दे दिया तो सत्य पश्चिम में अनुसंधान के रूप में विद्यमान है। अब हम कहते हैं कि हमको मत सिखाओ हमको बहुत पहले से पता है। तो ज़रा ध्यान देने की ज़रूरत है। यदि हमने विकृत नहीं किया होता तो वे हमको समझाते ही क्यों और कैसे? यह अपनी गलती का स्वीकार भाव यदि अब भी नहीं आया तो शायद फिर कभी नहीं आएगा। गाय, जातीगत व्यवहार और मुसलमान छूट गए हमसे तो आज भी इस धरा पर पहले रहे सभी संतों की नज़रें इनायत हो सकती हैं।

हमारे ऋषि मुनियों ने यही शिक्षा सबसे पहले दी है। जब लाओ त्ज़ु से पूछा गया तो उसने यही कहा था कि यह ज्ञान हिमालय के पास जो लोग रहते हैं से आया है। और वह अपने शरीर को छोड़ने हिमालय ही जा रहा था तब राजा ने पकड़कर उसका ज्ञान लिखवाया, जो ‘Tao te Ching’ नाम से मौजूद है।

हमने अपने फ़ायदे के लिए सत्य को बदल दिया लेकिन सत्य ऐसे कहीं बदला है?

वैसे सभी अपने धर्म की यात्रा पर हैं, और उसके लिए हम आज कहाँ हैं यह पता लगना ज़रूरी है। जैसे आईआईटी कोचिंग वाले पहले टेस्ट लेते हैं कि बच्चे को कितना ज्ञान है, उसी अनुसार उसको शिक्षा भी देना होगी। अपने धर्म की, अपने सत्य की यात्रा पर निकलना ही हिंदू होना है। मंदिर में तो कम बुद्धि वाले को जाने की ज़रूरत होती है, ताकि आपको इस यात्रा पर जाने लायक़ बुद्धि प्राप्त हो सके साधु संतों की वाणी के माध्यम से। अब जो व्यक्ति उनका प्रबंध करेगा उसकी रोजी रोटी का प्रबंध भी करना होगा समाज को, इसलिए मंदिर, नहीं तो गुरुजी आए और सारे लोग अपने काम में व्यस्त हैं दिनभर। इसीलिए नेहरू ने पहला बांध बनने पर कहा ‘ये आज के मदिर हैं’ यानी यहाँ से हमारी जो आमदनी होगी उससे लोगों की भूख मिटेगी। प्रगति होगी और तभी वे धर्म की यात्रा पर निकल पाएँगे, अभी तो भूख का इंतज़ाम करने में ही जीवन निकल जाता है।

तो उस सत्य का अनुसंधान खुद पर करने का समय नहीं मिलता। और यही धर्म को स्थापित करना है। मंदिरों से पुराने जमाने में हुआ था। साधु के प्रवचनों से पुराने जमाने में हुआ था। अब तो सोशल मीडिया पर ही उपलब्ध है, और इंटर्कॉंटिनेंटल भोजन ( अनुभव) मौजूद है तो कोई क्यों रोज़ जो खाता है वह खाएगा?

अब इन बच्चों को ज़बरदस्ती करके तुम हिंदू नहीं बना सकते। हिंदू तो कोई इच्छा से ही बनता है। और ऐसा हिंदू ही मुसलमान या अन्य को अपने से अलग नहीं समझेगा , वह दूसरे कॉलेज का विध्यार्थी है बस।

Osho International Online (OIO) provides facility to learn these from your home,

1. through Osho Meditation Day @€20.00 per person. OIO rotate times through three timezones NY,Berlin and Mumbai. You can prebook according to the convenient time for you.

2. There is OSHO Evening Meeting streaming which can be accessed every day at local time starting 6:40 pm (of which Osho says that he wants his people to view it all over the world and these days it is possible) and 16 of the meditations mostly with video instructions and so much more on iOSHOthrough App.

3. There is a 7 days Free Trial also for people who would like to first try it out.

This is an opportunity for learning and knowing Osho through these sannyasins who lived in his presence and brought to life his words in best possible quality in all formats.

Disciples of Jesus left him alone in last minutes but Osho’s disciples remained with him till he left his body willingly after working, till last day, for all of us to get enlightened. Jesus tried hard till last minute, before being caught, to teach meditation to his disciples. As per Saint John’s Gospel:- Jesus used word ‘Sit’ to transfer his meditative energy to them and went on to pray God, but on returning he found them sleeping. He tried two times again but in vain.

Even today Zen people use word ‘Sit’ for meditation in their saying ‘Sit silently, do nothing, season comes and the grass grows by itself green’. 

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Hi ….. I write my comments from my personal experiences of my inner journey. This post may include teachings of Mystics around the world that I found worth following even today. For more about me and to connect with me on social media platforms, have a look at my linktree website for connecting with my social media links, or subscribe my YouTube channel and/or listen to the podcasts etc.

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