होंश – updated

Stillness of mind and serenity of mindfulness act like Mont Blank
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होंश पर मेरी आवाज़ मैं Radio Publicf podcast दर्शन (Philosia) पर

हिंदी में आप मेरे पॉड्कैस्ट शो – दर्शन (Philosia) को इन पर भी सुन सकते हैं-

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यदि मेरे जीवन में मेरी साधना को एक शब्द में कहने को कहा जाए तो वह होगा ‘होश’. पिछले 35 वर्षों से सुबह toothbrush का समयपूरी तरह मेरा अपना समय है। इसी में मैंने होश को साधा। पूरा ध्यान इस विडीओ में बताए अनुसार किया। धीरे धीरे यह मेरे जीवन केहर काम में अतिक्रमण कर गया। मुझे पता ही नहीं चला। लेकिन मुझे लोग कहते थे कि शाम को काम से आप बड़े ताजे होकर लौटते हैं।मुझे राज का पता आज चला इसे सुनने के बाद।

हम सभी बचपन में होंशपूर्वक जीवन जी चुके हैं, या जीते हैं। विचार नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं, बस सीधे action पर हम आ जाते हैं। Twitter पर मौजूद इस विडीओ से आपको पता चलेगा कि हम होंशपूर्वक जीवन फिर कैसे जी सकते हैं। अपने काम को पूरा होंशपूर्वक करके।

We all lived this meditative state in our childhood. The video in the link is a proof of it. We all have danced like this baby, just we have forgotten it. We have to learn to dance like this baby is dancing then the dance itself becomes ‘meditation’. Only such dance will help one to find God by dancing like Rumi found. He is seeing herself dancing from above that is why she smiles at end.

इसको होंश में होकर dance करना कहेंगे।

मैंने भी यह अनुभव किया है जबसे मैंने पानी वैसे पीना शुरू किया जैसे मैं बचपन में पीता था। एक एक घूँट पीकर साँस छोड़ता था और नज़रें पानी के लेवल पर लगी होती थी। और सिर्फ़ एक अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि इस बच्ची के धीरे धीरे नाचने में भी वही होंश कारण है और उसका पूरा आनंद हमें मिलने लगता है। पैसा या power इस आनंद को पाने के लिए उपयोगी नहीं है। यह हमारे भीतर मौजूद है ही, बस हम उसको खोते इसलिए हैं कि हमारा ध्यान उस ओर से हटकर संसार की तरफ़ ही गया है। इसे वापस के लिए बस एक छोटी सी शुरुआत करनी है। और एक बार इसका अनुभव हमारे जीवन को पूरा बदलकर रख देता है।

होश या awareness पर ओशो का सबसे सटीक कथन

कबीर इसी को सुरती कहते हैं।

सूरत सम्भाल ऐ गाफ़िल, अपना आप पहचान।

कबीर कहते हैं कि यदि तूने होश को सम्भाल लिया तो तुझे अपना स्वामी, अपना आत्मा, अपना स्वभाव या अपना राज्य अपने आप मिल जाएगा। यह होश या awareness या कहें mindfulness मनुष्य की सबसे मूल्यवान संपदा है, और इस संसार में से कुछ पल चुरा लेना है- जैसे मछली सागर के पानी में से अपने जीवन को बनाए रखने के लिए सहज ही आक्सिजन/oxygen चुरा लेती है।

मेरे अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि ‘ऐसे ही थोड़े से प्रयास से हम भी अपने होश को सहज ही बनाए रखने में सफल हो जाते हैं। फिर धीरे धीरे यह सारे काम में सहज हो जाता है। क्योंकि शरीर को किसी काम को सहज होकर करने के लिए कम ऊर्जा लगती है तो वह वैसा ही होने लगता है। नींद भी रात को सोते ही आ जाएगी, और पाँच से छह घंटे की नींद में आप तरोताज़ा महसूस करेंगे। आपके निर्णय लेने की क्षमता में भी काफ़ी इज़ाफ़ा हो जाएगा। यह सब bye-product हैं, लेकिन कोई इसके लिए सहज होने का प्रयत्न करेगा तो वही असहजता का कारण हो जाएगा। सहज का मतलब ही है बस करना है, कोई कारण नहीं है उसके पीछे।’

ओशो कहते हैं:

मैं तुमसे कहता हूं: सिगरेट अगर पीते हो तो ध्यानपूर्वक पीयो। यह और ही बात कह रहा हूं। मैं तुमसे कह रहा हूं: जब तुम सिगरेट अपने खीसे से निकालो, पाकेट सिगरेट का निकालो, तो जल्दी मत निकालना जैसे तुम रोज निकालते हो। जल्दी क्या? धीरे से निकालना। बस विपस्सना शुरू हो जाएगी। बिलकुल धीरे से निकालना। इतने आहिस्ता जैसे कोई जल्दी नहीं, अनंत काल पड़ा है, जल्दी क्या है? बिलकुल आहिस्ता-आहिस्ता निकालना। जितने धीरे निकाल सको उतने धीरे निकालना। जब सिगरेट ही पीने जा रहे हैं तो जरा ढंग से पीयो, थोड़ी शालीनता से पीयो। यह क्या चोरी-चपाटी कि जल्दी से निकाला और किसी तरह धुआं अंदर-बाहर फेंका, फेंकी सिगरेट, पश्चात्ताप भी किए जा रहे हैं कि नहीं पीना चाहिए, यह बहुत बुरा हो रहा है.

भूल हो रही है। थोड़ी संस्कार से पीयो!

थोड़ी शालीनता, थोड़ा प्रसाद! सिगरेट का डब्बा हाथ में लो, फिर सिगरेट को बाहर निकालो, फिर ठीक से सिगरेट को डब्बे पर ठोंको, बजाओ। फिर आहिस्ता से मुंह में रखो। फिर माचिस निकालो। फिर माचिस जलाओ। आहिस्ता से, जैसे कि पूजा…धीमे से कोई पूजा का दीप जलाता है, ऐसे सिगरेट को जलाओ। भयभीत क्या हो? इतने डरे क्या हो? पश्चात्ताप क्या है? तुम्हें प्रीतिकर लग रहा है, तुम्हारा जीवन है, तुम अपने मालिक हो। तुम किसी की कोई हानि नहीं कर रहे हो। और अगर तुम अपनी हानि भी करना चाहते हो तो तुम उसके भी हकदार हो। लेकिन इसको एक कलात्मकता दो। और तुम चकित हो जाओगे, तुम्हें पहली दफा पाप नहीं मालूम पड़ेगा, मूर्खता दिखायी पड़ेगी। और वहीं भेद है। पाप नहीं, पाप से तो कोई छुटकारा हुआ नहीं। पाप है, ऐसा तो कहते-कहते सदियां बीत गईं। किस पाप से आदमी को छुड़ा पाए हो? मैं नहीं कहता सिगरेट पीना पाप है; यद्यपि मैं जरूर कहता हूं, मूढ़ता है। पाप क्या है? पर मूढ़ता निश्चित है। बस मूढ़ता तुम्हें दिखाई पड़ने लगे…और जितने धीमे-धीमे इस प्रक्रिया को करोगे उतनी स्पष्टता से मूढ़ता दिखाई प़ड़ेगी। इसका वैज्ञानिक कारण है। जिस काम को भी हम करने के आदी हो गए हैं, वह काम यंत्रवत हो जाता है; मशीन की तरह कर लेते हैं। अगर तुम उस प्रक्रिया को शिथिल कर दो तो तुम अचानक पाओगे कि तुम उसी काम को होशपूर्वक कर रहे हो, यंत्रवत नहीं।

तुम एक खास चाल से चलते हो। बौद्ध ध्यानशालाओं में वे तुम्हारी चाल बदल देते हैं। वे कहते हैं: इसको आधा कर दो, चाल को। होशपूर्वक धीमे चलो। छोटे-छोटे कदम रखो। तुम चकित होओगे, जब भी तुम्हारा होश खो जाएगा, तुम फिर कदम जोर से रख दोगे, जो तुम्हारी आदत है। अगर होश रखना है तो कदम धीमे रखना पड़ेगा; अगर कदम धीमे रखना है तो होश रखना पड़ेगा। अगर होश खोकर चलना है तो फिर पुरानी आदत पर्याप्त होगी। किसी भी प्रक्रिया को, अगर तुम उसकी गति धीमी कर दो तो उसके साथ होश जुड़ जाता है। भोजन भी अगर आहिस्ता करो, बहुत आहिस्ता, अड़तालीस बार चबाओ हर कौर को, तो तुम चकित हो जाओगे कि कितना होशपूर्वक तुम कर रहे हो! क्योंकि हिसाब रखना है, अड़तालीस बार चबाना है, ऐसे ही लीलते नहीं चले जाना है। मैं तुमसे कहता हूं कि ज्यादा भोजन मत करो। मैं कहता हूं अड़तालीस बार चबाओ और होशपूर्वक धीमे-धीमे भोजन करो। अपने-आप भोजन की मात्रा एक तिहाई हो जाएगी। उतनी ही हो जाएगी जितनी जरूरी है, और ज्यादा तृप्त करेगी, ज्यादा परितृप्त करेगी। क्योंकि उसका रस फैलेगा, ठीक पचेगा। ऐसी ही किसी भी प्रक्रिया को धीमा करो। अगर वह सार्थक प्रक्रिया है तो टूटेगी नहीं। अगर व्यर्थ प्रक्रिया है, अपने-आप टूट जाएगी, क्योंकि मूढ़ता स्पष्ट हो जाएगी। पाप को छोड़ना पड़ता है, मूढ़ता को छोड़ना नहीं पड़ता; जानना ही पड़ता है, मूढ़ता छूट जाती है।” (from “मरौ हे जोगी मरौ – Maro He Jogi Maro (Hindi Edition)” by Osho .)

कहे वाज़िद पुकार में ओशो कहते हैं

“मैं कहता हूं, कुछ भी गलत नहीं; बोधपूर्वक जो भी करो, ठीक। बोध सही, अबोध गलत। बस सीधे से सूत्र हैं——जाग्रत होकर तुम जो भी करो, होशपूर्वक जो भी करो, ठीक है।

नागार्जुन से एक चोर ने पूछा था: आप कहते हैं होशपूर्वक जो भी करो, वह ठीक है। अगर मैं होशपूर्वक चोरी करूं तो?

नागार्जुन ने कहा: तो चोरी भी ठीक है; होशपूर्वक भर करना, शर्त याद रखना!

उस चोर ने कहा: तो ठीक है, तुमसे मेरी बात बनी। मैं बहुत गुरुओं के पास गया, मैं जाहिर चोर हूं। जैसे गुरु प्रसिद्ध हैं, ऐसे ही मैं भी प्रसिद्ध हूं। सब गुरु मुझे जानते हैं। आज तक पकड़ा नहीं गया हूं। सम्राट भी जानता है; उसके महल से भी चोरियां मैंने की हैं, मगर पकड़ा नहीं गया हूं। अब तक मुझे कोई पकड़ नहीं पाया है। तो जब भी मैं किसी गुरु के पास गया, तो वे मुझसे यही कहते हैं——पहले चोरी छोड़ो, फिर कुछ हो सकता है। चोरी मैं छोड़ नहीं सकता। तुमसे मेरी बात बनी। तुम कहते हो चोरी छोड़ने की जरूरत ही नहीं है?

नागार्जुन ने बड़े अदभुत शब्द कहे थे। नागार्जुन ने कहा था: तो जिन गुरुओं ने तुमसे कहा चोरी छोड़ो, वे भी चोर ही होंगे; भूतपूर्व चोर होंगे, इससे ज्यादा नहीं। नहीं तो चोरी से उनको क्या लेना—देना? मुझे चोरी से क्या लेना—देना? मैं तुमसे कहता हूं होश सम्हालो, फिर तुम्हें जो करना हो करो। मैं तुम्हें दीया देता हूं; फिर दीए के रहते भी तुम्हें दीवाल से निकलना हो, तो निकलो। मगर मैं जानता हूं, जिसके हाथ में दीया है, वह द्वार से निकलता है। मैं नहीं कहता कि दीवाल से मत निकलो।

अंधेरे में जो आदमी है, उससे क्या कहना कि दीवाल से मत निकलो! वह तो टकराएगा ही, वह तो गिरेगा ही। उसे तो द्वार कैसे मिलेगा? दीवाल बड़ी है; चारों तरफ दीवालें ही दीवालें हैं। हमने ही खड़ी की हैं। निकल नहीं पाओगे। और जब निकलोगे नहीं, बार—बार गिरोगे। और पुजारी—पंडित चिल्ला रहे हैं कि दीवाल से टकराए कि पाप हो गया। फिर टकराए, फिर पाप हो गया! और जितने तुम घबड़ाने लगोगे, उतने ज्यादा टकराने लगोगे। उतने तुम्हारे पैर कंपने लगेंगे।

नागार्जुन ने ठीक कहा——मैं दीया देता हूं, अब तुझे दीवाल से निकलना हो, तेरी मर्जी; मगर दीया भर न बुझ पाए, दीए को सम्हाले रखना।

वह चोर पंद्रह दिन बाद आया, उसने कहा: मैं हार गया, तुम जीत गए। तुम आदमी बड़े होशियार हो। तुमने खूब मुझे धोखा दिया। मैं जिंदगी—भर लोगों को धोखा देता रहा, तुमने मुझे धोखा दे दिया! आज पंद्रह दिन से कोशिश कर रहा हूं होशपूर्वक चोरी करने की, नहीं कर पाया। क्योंकि जब होश सम्हलता है, चोरी की वृत्ति ही चली जाती है; जब चोरी की वृत्ति आती है, तब होश नहीं होता।

तुम जरा करके देखना, तुम भी करके देखना, होशपूर्वक झूठ बोलकर देखना। होश सम्हलेगा, सच ओंठों पर आ जाएगा। होश गया, झूठ बोल सकते हो। जरा होशपूर्वक कामवासना में उतरकर देखना। होश आया, और सारी वासना ठंडी पड़ जाएगी, जैसे तुषारपात हो गया! होश गया, उत्तप्त हुए। बेहोशी में ताप है, ज्वर है। होश शीतल है। होशपूर्वक कोई कामवासना में न कभी उतरा है, न उतर सकता है। इसलिए मैं तुमसे नहीं कहता कामवासना छोड़ो, मैं तुमसे कहता हूं होश सम्हालो। फिर जो छूट जाए, छूट जाए; जो न छूटे, वह ठीक है। होशपूर्वक जीवन जीने से जो बच जाए, वही पुण्य है; और जो छूट जाए, छोड़ना ही पड़े होश के कारण, वही पाप है। मगर पाप—पुण्य का मैं तुम्हें ब्योरा नहीं देता, मैं तो सिर्फ दीया तुम्हारे हाथ में देता हूं।

और तुम्हारे पंडित—पुरोहित, तुम्हारे राजनेता, तुम्हारे नीतिशास्त्री, उनका काम यही है: फेहरिस्त बनाओ, नियम बनाओ, कानून बनाओ; इतने कानून दे दो कि आदमी दब जाए, मर जाए!

बौद्ध ग्रंथों में तैंतीस हजार नियम हैं नीति के। याद भी न कर पाओगे। कैसे याद करोगे? तैंतीस हजार नियम! और जो आदमी तैंतीस हजार नियम याद करके जीएगा, वह जी पाएगा? उसकी हालत वही हो जाएगी, जो मैंने सुनी है, एक बार एक सेंटीपीड, शतपदी की हो गई।

यह शतपदी, सेंटीपीड जो जानवर होता है, इसके सौ पैर होते हैं। चला जा रहा था सेंटीपीड, एक चूहे ने देखा। चूहा बड़ा चौंका, उसने कहा: सुनिए जी, सौ पैर! कौन—सा पहले रखना, कौन—सा पीछे रखना, आप हिसाब कैसे रखते हो? सौ पैर मेरे हों तो मैं तो डगमगाकर वहीं गिर ही जाऊं। सौ पैर आपस में उलझ जाएं, गुत्थमगुत्था हो जाए। सौ पैर! हिसाब कैसे रखते हो कि कौन—सा पहले, फिर नंबर दो, फिर नंबर तीन, फिर नंबर चार, फिर नंबर पांच…सौ का हिसाब! गिनती में मुश्किल नहीं आती?

सेंटीपीड ने कभी सोचा नहीं था; पैदा ही से सौ पैर थे, चलता ही रहा था। उसने कहा: भाई मेरे, तुमने एक सवाल खड़ा किया! मैंने कभी सोचा नहीं, मैंने कभी नीचे देखा भी नहीं कि कौन—सा पैर आगे, कौन—सा पहले। लेकिन अब तुमने सवाल खड़ा कर दिया, तो मैं सोचूंगा, विचारूंगा।

सेंटीपीड सोचने लगा, विचारने लगा; वहीं लड़खड़ाकर गिर पड़ा। खुद भी घबड़ा गया कि कौन—सा पहले, कौन—सा पीछे।

एक जीवन की सहजता है। तुम्हारे नियम, तुम्हारे कानून सारी सहजता नष्ट कर देते हैं। तैंतीस हजार नियम! कौन—सा पहले, कौन—सा पीछे? तैंतीस हजार का हिसाब रखोगे, मर ही जाओगे, दब ही जाओगे, प्राणों पर पहाड़ बैठ जाएंगे।

मैं तो तुम्हें सिर्फ एक नियम देता हूं——होश। बेहोशी छोड़ो, होश सम्हालो।

और ये तैंतीस हजार नियम भी बेईमानों को नहीं रोक सकते। वे कोई न कोई तरकीब निकाल लेते हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है——कि जहां भी संकल्प है, वहीं मार्ग है। उस कहावत में थोड़ा फर्क कर लेना चाहिए। मैं कहता हूं——जहां भी कानून है, वहीं मार्ग है। तुम बनाओ कितने कानून बनाते हो, मार्ग निकाल लेगा आदमी।”

और मेरे अनुभव से मैं यह कहता हूँ कि यह साधारण सा लगने वाला ध्यान बड़ा करामाती है, इसने मेरी आँखों के सामने एक दर्पण बनाने में बड़ी सहायता की और उसी से यह सम्भव हो पाया कि मैं अपने भीतर झांक सका। नीचे ओशो के इसी बाबत दिए वक्तव्य जो मेरे जीवन में मैंने सत्य घटित होते पाया, इससे यह बात भी साबित होती है कि उनकी कही हर बात सच है।

“तुम्हारी आंख में जो छिपा है, वह तुम्हारी आंख को नहीं दिखाई पड़ सकता है।
उसकी कला सीखनी होगी। उसके लिए दर्पण बनाना होगा।
अगर तुम्हें अपनी आंख देखनी हो तो दर्पण बनाना होगा, तो आंख देख सकोगे।
हालांकि आंख और सब कुछ देख लेती है, यह मजा, यह विडंबना! आंख सब देख लेती है, सिर्फ अपने को छोड़कर।
तुम सब देख लेते हो, सिर्फ अपने को छोड़कर।
तुम्हें आईना बनाना होगा। तुम्हें ध्यान का दर्पण बनाना होगा।
उस में तुम्हें अपनी आंख दिखाई पड़ेगी।
अपने भीतर छिपे हुए आकाश का पहली दफा प्रतिबिंब मिलेगा।
और बस उसी क्षण से तुम अंधे नहीं हो।
अंधे तुम कभी भी न थे।
मगर उस क्षण तुम्हें पहचान होगी कि मैं न अंधा था, न अंधा हूं, न अंधा हो सकता हूं।
बस आंख बंद किए बैठा था!”

ओशो, बिरहिनी मंदिर दियना बार, प्रवचन #पांचवां तत्‍वमसि,
दिनांक 15 जनवरी, 1979, पूना

एक सलाह और देना चाहता हूँ कि यदि आप सहज जीवन के सूत्र पोस्ट में दिए सुझाव भी अपने जीवन में प्रयोग करके देखेंगे और आपको लगे कि यह ध्यान में सहयोगी है तो इससे आपका आत्मज्ञान का मार्ग बग़ैर किसी गुरु के घर बैठे काफ़ी छोटा हो सकता है। छोटा कह रहा हूँ, आसान नहीं यह ध्यान में रखा जाए। क्योंकि ये दोनों एक दूसरे को मदद पहुँचाते हैं।

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