मनुष्य यंत्र की भाँति जीता है।English part updated with a video.

ओशो का प्रवचन सौजन्य से OSHO INTERNATIONAL FOUNDATION ऑन YouTube


ओशो का यह Audio मनुष्य के जीवन के महत्वपूर्ण रहस्य को उद्घाटित करता है कि जीवन भर अपने सारे प्रयत्न के बावजूद भी वह क्यों जीवन के अंत तक परेशान, दुखी और असंतुष्ट बना रहता है? ख़ुशी उसके जीवन का बस एक छोटा से हिस्से में ही नसीब होती है। उसे मनोचिकित्सक भी इतनी सरलता से उसको नहीं समझा सकते जो ओशो ने बड़ी सरलता से समझाने का प्रयास किया है। 

मनुष्य का जीवन ही एक ऐसा जीवन है जिसमें उसकी औलाद अपने पाँव पर खड़ा होकर चलने में एक साल का समय लेती है। फिर उसे सब कुछ सीखना पड़ता है जानवर के समान यांत्रिक या सीखा-सिखाया पैदा नहीं होता है। इस हिसाब से जानवर की शुरुआत मनुष्य से अच्छी है लेकिन जानवर पूरे जीवन यंत्रिक ही बना रहता है। और मनुष्य भी यदि यांत्रिक बना रहे पूरे जीवन तो जानवर के जैसे उसके भी transformation की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है।

इसलिए मनुष्य के लालन पालन और शिक्षा के लिए एक समाज और धर्म का ताना-बाना, और आज के मनुष्य को तो बहुत अच्छी हालत में, तैयार मिलता है। इस सीखने की क्षमता के कारण वह निरंतर बदलाव की क्षमता भी विकसित करता है। लेकिन इस सामाजिक ताने-बाने की एक बुराई भी है – क्योंकि वह हमारे चारों ओर जिस यांत्रिक वातावरण का निर्माण हमारे विकास करने और निरंतर विकास की क्षमता बनाने में सहयोगी होता है, हम उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। और अधिकतर तो उसी को मनुष्य जीवन की सीमा या उपलब्धि मानकर पूरा जीवन गुज़ार देते हैं। और कोई ओशो समान संत के शब्द हमारे कानों में नहीं जा पाएँ तो शायद हज़ारों जन्म वह मनुष्य होकर भी यांत्रिक जीवन ही जिये चले जाता है। विकास शब्द का मतलब है, जिसका विस्तार या जिसमें सुधार की अनंत सम्भावनाएँ है और ऐसा अनंत समय तक होता ही रहता है। तो यदि मनुष्य अपने विकास करने के विशेष गुण का पूरा प्रयोग नहीं करता है तो यह उसका खुद का निर्णय ही हो सकता है।

मैंने अपने जीवन में मनुष्य की प्रयोग करने की क्षमता को पूरा उपयोग किया। और ऐसा करते करते ही मैं एक दिन ओशो के ऐसे ही वक्तव्य को पढ़कर उसको अपने जीवन में प्रयोग करके देखने लगा। वाक़ई यह प्रयोग कमाल का है! इससे हम जिस ताने-बाने में पले बढ़े उससे हमको बाहर ले जाकर अपने विकास की क्षमता का हमें सबूत मिलता है। और विकास का मतलब ही कभी ख़त्म नहीं होने वाला परिवर्तन है। जैसे bomb में एक बार आग लगा दो तो वह जब तक पूरा बारूद नहीं जल जाए तब तक जलता रहता है, उसी प्रकार मेरे अंदर इसने जैसे एक बत्ती सुलगा दी हो। और मज़ा यह की होंश की यह आग, एक ठंडी आग है, यह जब भी जितने समय भी जलेगी आपको बड़ी ठंडक महसूस होगी। और बढ़ती ही चली जाएगी जब तक की आपको अपने स्वभाव, अपनी आत्मा से परिचय नहीं करवा देवे।

मेरा यही निवेदन है कि इसको एक बार अपने जीवन में पूरी ईमानदारी के साथ ज़रूर प्रयोग करें। ओशो इंटर्नैशनल फ़ाउंडेशन, पूना, इंडिया, अपने सन्यासियों के साथ एक पूरा दिन आपको घर बैठे ओशो मेडिटेशन डे के रूप में सीखने का अवसर मात्र €20 में महीने के पहले Sunday को देता है। इनके द्वारा विकसित iOSHO ऐप भी आपको अपने मोबाइल के सहारे लगातार अपने आपको, अपने खुद की व्यक्तिगत यात्रा के विकास में बहुत सहयोगी साबित हो सकता है।

I live spontaneously – this video is nearest to the above audio stating that man lives like a machine, unaware or unconsciously. Life is a living laboratory – this is also nearest to the Audio in Hindi.

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