ताओ पुरुष की तरह aggressive नहीं है, स्त्री की तरह receptive है.

मातृशक्ति की तरह वह संसार को आपने गर्भ में सम्भाले हुए है और संसार उसके गर्भ में धीरे धीरे बढ़ रहा है।

उसी से ऊर्जा ग्रहण करके संसार विकसित हो रहा है। हमारे द्वारा किया गया कोई भी कर्म इसीलिए कोई मायने नहीं रखता है। हम इस संसार रूपी गर्भस्थ शिशु के शरीर में कोई बेक्टेरिया या एक सेल से ज़्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। लेकिन किसी भी क्षण में उस मातृशक्ति से अलग भी नहीं हुए हैं और मनुष्य होकर हम इसी माध्यम से उसे जानने के अधिकारी भी हैं, लेकिन संसार की कोई उपाधि, ताक़त, सत्ता का वहाँ कोई मूल्य नहीं है। जब सिर्फ़ तुम ही पूरे ख़ाली मिल जाओगे तो वह खुद तुम्हारे भीतर ज्ञान के रूप में चली आएगी, वह तो किसी स्त्री की तरह बस इंतज़ार करना हो जानती है।