5 Ways to resist people who manipulate nicely.

Krishna is not manipulating here because her lovers know that he is just playing and his eyes are innocent, so they do not even feel that they are naked.

Except Krishna, beware of all because it comes under manipulative personality.

www.psychologytoday.com/us/blog/defining-memories/202205/5-ways-resist-people-who-manipulate-nicely

What Jesus suggested goes against this article. OSHO says in one of his talks in Hindi ” Kopalein fir foot aayin ” (कोपलें फिर फूट आयीं) that if a person is manipulating you then let him keep doing it and keep enjoying whatever the result. This is pouring more Love, on another because of compassion on his state of mind. The other is doing all these to see your face full of sadness. But your happiness, joy and dance will force him to think upon his own behaviour and that may lead to his transformation or stopping of such acts.

It happened with OSHO while he was in jail for 3 days in biggest Jail of USA! All staff, prisoners were full of tears when was going out.

In the photo by M A Gandhi & Company, Bombay, India named ‘Krishna-Leela’ Krishna seems to be doing manipulative technique but his innocence and selfless Love brought them into a state where they do not feel shy of his presence. It is like kids are playing a game.

His innocence changed the behaviour of his Lovers or followers. He converted successfully a win-lose situation in Love into a win-win situation.

As far as Tantra is concerned it can be said that the male must be innocent so that female forgets his presence and get involved in a child like way with male in sex.

Full Q & A from the book I mentioned above for more details:

#5 chapter

अपार्थिव तत्व की पहचान

प्रश्न: ओशो,

जब कोई मुझसे छल और दगाबाजी करता है या जब कोई मुझे वस्तु की तरह उपयोग करता है, ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए? मैं उस व्यक्ति को चोट भी नहीं पहुंचाना चाहती। मन की शांति कैसे मिले? मैं टूट-फूट गई हूं।

जीवन की उलझनों में दूसरे कभी भी उत्तरदायी नहीं होते; सारा उत्तरदायित्व अपना होता है। जैसे तुमने कहा कि जब कोई मुझसे छल और दगा करता है, तो मेरे दिल को चोट पहुंचती है। थोड़ा सोचो, दिल को चोट किसी के छल और दगा करने से नहीं होती। तुमने चाहा था कि कोई छल और दगा न करे, इसलिए चोट होती है। यह तुम्हारी चाह का फल है।

और सारी दुनिया तुम्हारी चाह को मान कर चले, यह तुम्हारे हाथ में नहीं। यह किसी के भी हाथ में नहीं। लेकिन हम यूं ही सोचने के आदी हो गए हैं कि हर चीज का दायित्व दूसरे पर थोप दें। इससे आसानी होती है, राहत मिलती है। राहत मिलती है कि मैं जिम्मेवार नहीं हूं। अब कोई छल कर रहा है, इसलिए कष्ट हो रहा है।

लेकिन तुमने चाहा ही क्यों कि कोई छल न करे? और यह हमारे हाथ में कहां है कि हम ऐसी दुनिया बना लें जिसमें छल और कपट न हो? छल भी होगा, कपट भी होगा। हम इतना जरूर कर सकते हैं कि हम अपने को ऐसा बना लें कि दूसरे के छल और कपट को भी स्वीकार कर सकें। कर्म उसका है, फल उसका होगा। तुम्हें परेशानी क्यों हो? और तुम्हारी परेशानी उसके छल और कपट को नहीं रोक पाएगी।

हां, तुम अगर गैर-परेशान रह जाओ, तुम्हारी शांति में अगर कोई विघ्न और कोई बाधा न पड़े, तुम्हारा हृदय अगर निष्कंप रह जाए, कोई कलुष, कोई शिकायत, कोई शिकवा न उठे, तो शायद तुम उस दूसरे व्यक्ति को बदलने में समर्थ भी हो जाओ। यह बहुत मुश्किल है उस आदमी को धोखा देना, जो तुमसे धोखा खाने को चुपचाप राजी है; लेकिन न शिकायत है, न शिकवा है।

इतना गिरा हुआ आदमी जमीन पर पैदा ही नहीं हुआ और न पैदा हो सकता है। लेकिन तुम्हारा दुख, तुम्हारी पीड़ा उसकी विजय है। और जब उसे छल से और छलावे से विजय मिलती हो तो विजय को छोड़ना बहुत मुश्किल है।

मुझे बहुत प्रीतिकर रही है एक फकीर की कहानी।

एक पूर्णिमा की रात, और एक चोर उसके झोपड़े में घुस आया। फकीर के घर में कुछ भी नहीं है, सिर्फ एक कंबल है जिसे ओढ़ कर वह बरामदे में लेटा हुआ रात के पूरे चांद को देख रहा है। उसने चोर को भीतर आते देखा और उसकी आंखों में आंसू आ गए। आंसू इस बात के कि यह नासमझ चोर, इसे इतना भी पता नहीं है कि इस फकीर के घर में कुछ भी नहीं है।

काश, यह दो दिन पहले मुझे खबर कर देता तो मैं कुछ मांग कर जुटा लेता। इसके लिए कुछ तो इंतजाम कर लेता। गांव से दस मील दूर इस पहाड़ी पर चढ़ कर आया है और मेरे घर से खाली जाएगा! जीवन भर के लिए मेरे दिल को एक पीड़ा दे जाएगा। वह उठा, चोर के पीछे हो लिया। जैसे ही चोर घर के भीतर घुसा, फकीर ने मोमबत्ती जला ली।

चोर ने कहा: आप कौन हैं? फकीर ने कहा: तुम इसकी फिकर न करो। इतना ही समझो कि दोस्त हूं, दुश्मन नहीं। चोर ने कहा: क्या अकस्मात दो चोर इस घर में एक साथ घुस आए हैं? फकीर ने कहा: मैं घुस नहीं आया हूं। तीस साल से इस घर में रहता हूं। और यह मोमबत्ती मैंने इसलिए जला ली है कि तुम्हें कहीं कोई चोट न लग जाए। घर के भीतर अंधेरा है।

और इसलिए भी जला ली है कि तीस साल में मैं खुद भी कुछ खोज न पाया, यह घर इतना खाली है, इतना सूना है। शायद तुम्हारे भाग्य से कुछ मिल जाए।

और तुम्हारी कृपा से मैं भी कुछ भागीदार हो जाऊं! चोर तो ऐसे आदमी को देख कर बहुत घबड़ाया। यह मालिक है, और यह कैसी बातें कर रहा है! चोर ने कहा: मुझे जाने दो।

उस फकीर ने कहा: यूं नहीं। कम से कम घर की पूरी छानबीन तो कर लो। जब भी कोई काम करो तो पूरा करो। और जब भी कोई काम करो तो समग्रता से करो। और फिर भय किसका? तुम मजे से खोज-बीन करो, मैं सहायता के लिए तैयार हूं। अगर तुम मुझे भागीदार नहीं बनाना चाहते तो भी कोई हर्ज नहीं। मुझे तो मिला नहीं। यूं भी नहीं मिला, यूं भी नहीं मिलेगा। तुम सब ले जाना।

ठंडी रात, लेकिन चोर को पसीना छूट गया। उसने कहा: आप आदमी कैसे हैं? यह मकान आपका है। उस फकीर ने कहा: मकान अगर मेरा होता तो मेरे साथ आता और मेरे साथ जाता। न यह मेरे साथ आया और न यह मेरे साथ जाएगा। यह मकान किसी का भी नहीं है। मुझमें तुममें फर्क यह है कि मैं तीस साल पहले इसमें प्रवेश किया था, तुम तीस साल बाद पीछे प्रवेश किए हो।

लेकिन चोर ने कहा: कुछ भी हो, तुम मुझे क्षमा कर दो और मुझे जाने दो। मुझसे गलती हो गई। तो फकीर ने अपना कंबल उस चोर को ओढ़ा दिया और फकीर नंगा खड़ा हो गया। और फकीर ने कहा: रात सर्द है और गांव दूर है। अगर तुम्हें सर्दी-जुकाम पकड़ गया तो जिम्मेवारी मेरी होगी। और मैं तो घर के भीतर हूं, किसी तरह गुजार लूंगा सूरज के उगने तक। और कल कहीं से मांग कर कंबल भी जुटा लूंगा। तुम यह कंबल ही ले जाओ। कम से कम राहत रहेगी मन को। तुमने मुझे इतना गौरव दिया है। मुझे सम्राट बना दिया। सम्राटों के घर में चोर घुसते हैं। फकीरों के घर में कोई चोर घुसा है! इनकार न करना। चोर इतनी घबड़ाहट में था, उसके हाथ ऐसे कंप रहे थे, लेकिन मजबूरी में उसने कंबल ले लिया कि किसी तरह बाहर हो जाऊं। जब वह बाहर हो गया तो उसने लौट कर देखा कि फकीर उसके पीछे चला आ रहा है।

उसने पूछा कि कृपा करके अब तो मुझे छोड़ दो। फकीर ने कहा: अब तुम्हें छोड़ कर क्या करूंगा? घर-बार तो तुम ले चले। अब अकेला रह कर मैं यहां क्या करूंगा? जहां तुम रहोगे वहीं मैं भी रहूंगा। तुमको तो राजी कर लिया, कंबल को कैसे राजी करूंगा? कंबल नाराज होगा कि इतने दिन मैंने साथ दिया और मुझे यूं छोड़ दिया! मैं छोड़ने वाला नहीं हूं। साथ ही रहेंगे। दुख-सुख जो होगा सहेंगे।

चोर ने कहा: मुझे माफ करो। यह कंबल अपना वापस ले लो और अपने घर में जाओ। मैं भूल से घर में घुस गया। मुझे पता न था कि यह एक फकीर का घर है। मेरी प्रार्थना, मेरी अर्जी स्वीकार कर लो। और मुझे क्षमा करो। वह फकीर कंबल लेकर भीतर चला गया।

और तभी चोर ने जोर की आवाज सुनी कि रुक! कमबख्त, लौट! चोर हिम्मतवर आदमी था, बहादुर आदमी था, लेकिन उसने ऐसी कड़कदार आवाज न कभी जीवन में सुनी थी। जेलों में रहा था। ऐसे काम किया था कि सूलियों पर चढ़ जाए। मगर यह आवाज, यह बुलंदगी! वह घबड़ाहट में पीछे लौट आया। फकीर ने कहा: सुन, दरवाजा खोल कर आया था, कम से कम दरवाजा को बंद तो कर जा। इतनी सभ्यता तो सीख। और मेरे पास जो कुछ था, मैंने तुझे दिया। कम से कम मुझे धन्यवाद तो दे। अब आ ही गया है तो कम से कम थोड़ी आदमीयत ही सीख कर जा। और तो मेरे पास कुछ भी नहीं है।

चोर ने जल्दी से धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागा। जब वह भाग रहा था तब फकीर ने खिड़की से कहा कि देख, जब वक्त पड़ेगा तो मैं ही तेरे काम आऊंगा। यह छोटा सा धन्यवाद तेरी जिंदगी के लिए छाया बन जाएगा।

और कुछ दिनों बाद चोर पकड़ा गया। आखिर चोर निन्यानबे बार बच जाए, लेकिन सौवीं बार तो पकड़ाने ही वाला है। और अदालत में पूछा गया कि कोई है जो तुम्हें जानता हो इस नगर में? चोर ने कहा: मेरा धंधा ऐसा है कि दिन में तो मैं बाहर निकलता नहीं। मेरा धंधा ऐसा है कि जब सब सो जाते हैं तब मैं निकलता हूं, तो परिचय का कोई उपाय नहीं।

हां, एक फकीर है जो मुझे जानता है। वह गांव के बाहर दस मील दूर रहता है। फकीर को बुलाया गया। वह प्रसिद्ध फकीर था। चोर नहीं जानता था, लेकिन मजिस्ट्रेट जानता था, अदालत जानती थी। उन्होंने उस फकीर को पूछा कि क्या तुम इस चोर को पहचानते हो? फकीर ने कहा: यह आदमी चोर नहीं है। इसे मैं पहचानता हूं, भलीभांति पहचानता हूं। एक रात यह मेरे घर मेहमान हुआ था। और चोर तो यह बिलकुल भी नहीं है। चोर होना तो दूर, मैंने इसे कंबल भेंट किया था, जो मैं अभी भी ओढ़े हुए हूं, इसने इसे भी लेने से इनकार कर दिया था। मैं इसका ऋणी हूं।

चोर होना तो दूर, मैं इसे कुछ भी न दे सका, फिर भी यह मुझे धन्यवाद देकर गया था। चोर होना तो दूर, जो सभ्य और शिष्ट कहे जाते हैं, वे भी इतने सभ्य और शिष्ट नहीं हैं कि जब द्वार किसी का खोलें तो द्वार बंद भी करके जाएं, यह द्वार बंद करके गया था। यह आदमी बड़ा भला है। यह आदमी बड़ा प्यारा है। मजिस्टे्रट ने कहा: फिर किसी और गवाही की जरूरत नहीं है। तुम्हारा शब्द पत्थर की लकीर है।

चोर की जंजीरें खोल दी गईं। फकीर बाहर निकला। चोर फकीर के पीछे आया। फकीर ने कहा: क्या बात है? चोर ने कहा: मुझे माफ कर दो। एक बार और माफ कर दो। उस रात तुम मेरे पीछे आए थे और मैंने तुम्हें लौटा दिया। मुझ जैसा अभागा नहीं है। अब आज मैं तुम्हारे पीछे आया हूं और सदा तुम्हारे पीछे रहूंगा। मुझे कभी लौटाना मत। मैंने बहुत आदमी देखे हैं, मगर बस आदमी की शक्लें हैं। आदमी मैंने तुममें देखा। मुझे अपने चरणों में ले लो। मुझसे जो सेवा बन पड़ेगी, मैं तुम्हारी करूंगा।

फकीर ने उसे अपने साथ ले लिया और रास्ते में कहा: तुझे पता है?

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरे भीतर कविता की कोई क्षमता है।

जिस रात तू आया था और वापस गया था और मैं खिड़की पर बैठ कर पूरे चांद को और तुझे जाते हुए देख रहा था, तो पहली बार मेरे जीवन में काव्य का जन्म हुआ, मैंने पहली कविता लिखी। एकमात्र कविता मैंने जीवन में लिखी। वह कविता बड़ी प्यारी है।

उस कविता का अर्थ है कि काश, यह मेरे हाथ में होता तो आज मैं इस चांद को तोड़ कर उस चोर को भेंट कर देता। मगर यह मेरे बस में नहीं है। इस दुनिया में तुम्हें सब तरह के लोग मिलेंगे। और यूं तुम अगर हर आदमी से प्रभावित होते रहे, थपेड़े खाते रहे, तो तुम्हारे जीवन की नौका यूं डगमगाती ही रहेगी। तुम किनारा कभी पा न सकोगे। तुम मंझधार में डूबोगे, साहिल तुम्हें मिलेगा नहीं।

एक बात ठीक से समझ लो। हम अपनी दुनिया खुद बनाते हैं। और अगर कोई तुम्हारे साथ छल करता है या कपट करता है, क्या छीन लेगा? तुम्हारे पास है क्या? तुम्हारे पास कुछ भी तो नहीं है। और जो गरीब छल-कपट कर रहा है, वह दीन-दरिद्र है, उसके पास भी कुछ नहीं है। सोचता है कि शायद छल-कपट से कुछ मिल जाएगा।

मेरी सलाह, पहली सलाह: जो तुम्हें धोखा दे, समझना कि बड़ा गरीब है। तुमसे तो ज्यादा गरीब है। जो तुम्हारे साथ छल करे, कपट करे, समझना कि बड़ा दीन है। तुमसे तो बड़ा भिखारी है। उस पर दया करना। उस पर करुणा करना। इसलिए नहीं कि तुम्हारी दया और करुणा से वह बदल ही जाएगा। वह बदले या न बदले, लेकिन तुम बदल जाओगे।

और असली बात यही है कि तुम बदल जाओ। और तुम एक ऐसी स्थिति में आ जाओ कि दुनिया तुम्हारे साथ कुछ भी करे, लेकिन तुम्हें डांवाडोल न कर सके। तुमने पूछा है कि लोग जब किसी वस्तु की तरह मेरा उपयोग करते हैं तो बड़ी चोट पहुंचती है। लेकिन तुम खुद अपने को वस्तु की तरह उपयोग कर रहे हो, यह तुमने सोचा? तुमने अपने को आत्मा की तरह उपयोग किया है कभी जीवन के किसी क्षण में? तुमने खुद अपने को वस्तु की तरह उपयोग किया है, एक शरीर मात्र।

और जब तुम खुद ही अपने साथ यह दुर्व्यवहार कर रहे हो, तो दूसरों से क्या शिकायत? वे तुमसे वही कर रहे हैं जो तुम अपने से कर रहे हो। और शरीर तो वस्तु है ही। तुम अपने भीतर छिपे हुए उस चैतन्य को पहचानने की कोशिश करो जो वस्तु नहीं है। फिर तुम्हारा कोई भी कैसा भी उपयोग करे, तुम भलीभांति समझोगे कि तुम दूर खड़े देख रहे हो, वह तुम्हारा उपयोग नहीं है।

सिकंदर भारत आया और भारत से लौटते वक्त अरबों की संपत्ति लूट कर ले गया। भारत की सीमा छोड़ने के पहले उसे याद आया कि उसके शिक्षा-गुरु अरिस्टोटल ने उससे कहा था कि जब भारत से तुम वापस आने लगो तो कम से कम एक संन्यासी को लेते आना। क्योंकि दुनिया में और सब कुछ है, हीरे हैं और जवाहरात हैं, लेकिन संन्यास की अदभुत कल्पना पूरब की बस अपनी है।

और मैं एक संन्यासी को देखना चाहता हूं, समझना चाहता हूं। आखिर सारा पूरब अपनी सारी प्रतिभा संन्यास की दिशा में क्यों अनुप्राणित करता है? तो सिकंदर ने खबर की आस-पास कि कोई संन्यासी यहां उपलब्ध होगा? किसी ने कहा: यूं तो बहुत संन्यासी हैं, लेकिन अगर तुम सच में ही किसी संन्यासी को ले जाना चाहते हो तो इस गांव के बाहर, नदी के किनारे वर्षों से एक संन्यासी का डेरा है, उसे राजी कर लो।

सिकंदर ने कहा: राजी कर लूं? यह मेरी भाषा नहीं है। मेरी तलवार हर चीज को राजी कर लेती है। तो उस गांव के लोगों ने कहा: फिर तुम्हें संन्यासी का कोई पता नहीं है। यह तलवार सब कुछ कर सकती है, लेकिन संन्यासी का कुछ भी नहीं कर सकती। सिकंदर की समझ के बाहर थी यह बात। सिकंदर गया और उसने घोषणा की संन्यासी से कि मैं महान सिकंदर, विश्वविजेता, तुम्हें निमंत्रण देता हूं; तुम मेरे राज्य के अतिथि रहोगे, सारा सुख, सारा वैभव जो मेरा है, तुम्हारा है; लेकिन तुम्हें मेरे साथ यूनान चलना होगा।

वह संन्यासी नग्न खड़ा था सुबह की धूप में। उस संन्यासी ने कहा: पहले तो तुम यह भ्रम छोड़ दो कि तुम विश्वविजेता हो। आज हो, कल पानी के बुदबुदे की तरह मिट जाओगे। यह भ्रम छोड़ दो कि तुम महान हो।

क्योंकि जिस आदमी को खुद यह भ्रम होता है कि मैं महान हूं, कम से कम वह तो महान नहीं होता। रही मेरे कहीं जाने की बात, संन्यास का मतलब ही है अपनी मर्जी से जीना, अपनी मौज, अपनी मस्ती। कभी आएगी मौज, कभी आएगी मस्ती, तो आऊंगा यूनान भी; लेकिन मुझे ले जाया नहीं जा सकता। यह तलवार म्यान के भीतर कर लो।

यह तलवार उनको डरा सकती है जिनको अपने भीतर के अमृत का कोई पता नहीं है।

सिकंदर ने कहा कि तुम मुझे जानते नहीं, मैं खूंखार आदमी हूं। मैं तुम्हारी गर्दन एक क्षण में, एक झटके में काट दूंगा।

वह फकीर हंसा। उसने कहा: अगर तुम्हें इसमें मजा आता हो, सुख मिलता हो, तो यह मेरा सौभाग्य होगा। गर्दन कभी तो गिरेगी ही। चलो, एक आदमी को सुखी कर गई। एक बात तुमसे लेकिन कह दूं, जब तुम मेरी गर्दन को जमीन पर गिरते देखोगे तो मैं भी अपनी गर्दन को जमीन पर गिरते देखूंगा।

क्योंकि मैं गर्दन नहीं हूं, मैं शरीर नहीं हूं। तुम मुझे न देख पाओगे। लेकिन मैं तुम्हें देख पाऊंगा। फिर खींच लो तलवार। और यह पहला मौका है सिकंदर के जीवन में एक ऐसे आदमी से मिलने का, जो निमंत्रण देता है कि खींच लो तलवार। फिर देर किस बात की है?

और सिकंदर के हाथ रुक जाते हैं और सिकंदर कहता है: मुझे माफ कर दें। मैं यह संन्यास की भाषा नहीं समझता।

उस संन्यासी ने कहा: अपने गुरु को सिर्फ यह घटना सुना देना।

शायद इस घटना से उन्हें कुछ समझ में आ जाए। तुम्हें पीड़ा होती है कि कोई तुम्हारा वस्तु की तरह उपयोग करे। वस्तुतः तुम्हारा कोई उपयोग करे, इससे ही पीड़ा होती है। क्योंकि उपयोग का मतलब है, तुम्हारा असम्मान। उपयोग का अर्थ है, तुम्हारे व्यक्तित्व को, तुम्हारी आत्मा को स्वीकृति नहीं दी जा रही।

तुमसे वही काम लिया जा रहा है जैसे किसी मशीन से कोई काम लेता हो। लेकिन चौबीस घंटे यही हो रहा है। तुम किसी की पत्नी हो, तुम किसी के पति हो। तुमने अपनी पत्नी की आत्मा जानी है या उसका शरीर ही जाना है?

तुमने अपने पति के भीतर झांका है या सिर्फ बाहर जो दर्पण में दिखाई देता है वही देखा है?

तुम्हारे बच्चे हैं, तुम उनका भी तो उपयोग कर रहे हो।

कोई अपने बच्चों को डाक्टर बनाना चाहता है, कोई इंजीनियर बनाना चाहता है, कोई वैज्ञानिक बनाना चाहता है।

लेकिन भीतरी आकांक्षा क्या है? आकांक्षा है कि इन बच्चों का उपयोग हो। इन बच्चों को धन में कैसे रूपांतरित किया जाए! ये बच्चे रुपये के सिक्कों में कैसे ढाले जाएं, यही तो तुम्हारी कोशिश है।

हर आदमी हर दूसरे का उपयोग कर रहा है। और यह तब तक जारी रहता है जब तक तुम अपने को न पहचान लो। कसूर किसी और का नहीं है।

तुम्हारे प्रश्न में झलक ऐसी है कि जैसे कसूर किसी और का है। तुम शिकार हो और शिकारी कोई और है। नहीं, तुमने खुद भी अभी अपने को नहीं जाना–उसको, जिसको तौला नहीं जा सकता; उसको, जिसका कोई जन्म नहीं; उसको, जिसकी कोई मृत्यु नहीं।

तुम उसे पहचान लो तो फिर कोई हर्ज नहीं है। फिर तुम्हें दुख न होगा।

फिर तुम्हें सिर्फ दया आएगी उस आदमी पर, जो तुम्हारा उपयोग कर रहा है।

तुम्हारी आंखों में आंसू आएंगे करुणा के, कि इस बेचारे को कुछ भी पता नहीं।

कहानी है यूनान के बहुत बड़े विचारक डायोजनीज के संबंध में। डायोजनीज नग्न रहता था, और एक सुंदर व्यक्ति था, अति बलशाली व्यक्ति था। उन दिनों सारी दुनिया में दासता की प्रथा थी। आदमी बेचे जाते थे, जैसे जानवर बेचे जाते हैं।

चार चोरों ने देखा इस आदमी को। उन्होंने बहुत आदमी देखे थे, लेकिन यह मूर्ति की तरह सुदृढ़, यह गढ़ा हुआ आदमी–सोचने लगे कि अगर इसे हम पकड़ लें–और यह फकीर है निश्चित, नग्न बैठा है, तो बाजार में इतनी कीमत मिल सकती है, जितनी दस-पंद्रह आदमियों को भी बेचने से न मिले। मगर इसको पकड़ेगा कौन? यह हम चार आदमियों के लिए काफी है। यह हम चारों को बेच देगा।

उनकी खुसफुस डायोजनीज ने सुनी, झाड़ियों के पीछे छुपे वे विचार कर रहे थे कि इसको कैसे फांसा जाए।

डायोजनीज ने कहा: बाहर आओ। झाड़ियों के पीछे खुसफुस करने से कोई फायदा नहीं।

मुझे बेचना है? मुझसे प्रार्थना करो। जंजीरों की कोई जरूरत नहीं है। मैं अपना मालिक हूं।

और अगर चार आदमियों की जिंदगी में खुशी आ सकती है मुझे बेचने से, मैं तुम्हारे साथ चलने को राजी हूं। वे चारों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे कि यह आदमी कहीं पागल तो नहीं है? डायोजनीज ने कहा: मत घबड़ाओ, मेरे पीछे-पीछे आओ।

वे बाजार में पहुंचे, जहां आदमी बेचे जा रहे थे। ऊंची तख्ती पर आदमी खड़ा किया जाता था और नीलामी बोली जाती थी। वे चारों आदमी डायोजनीज के सामने चोरों की तरह उसके आस-पास छिपे हुए खड़े थे। उनकी इतनी हिम्मत भी न थी कि वे कह सकें नीलाम करने वाले से कि हम एक गुलाम लाए हैं, इसको बेचना है।

अंततः डायोजनीज खुद ही तख्ती पर चढ़ गया। और उसने तख्ती पर चिल्ला कर जो ऐलान किया, वह सोचने योग्य है।

उसने ऐलान किया कि यहां जितने भी गुलाम इकट्ठे हुए हैं…वहां गुलाम इकट्ठे नहीं हुए थे, वहां रईस थे, राजकुमार थे, रानियां थीं, राजा थे, जो अच्छे गुलामों की तलाश में आए थे।

डायोजनीज ने कहा: यहां जितने भी गुलाम इकट्ठे हैं, मैं तुम सबको चुनौती देता हूं कि ऐसा मौका बार-बार न आएगा।

आज एक मालिक खुद अपने को नीलाम करता है। नीलामी सस्ती नहीं जानी चाहिए। गुलाम तो बहुत बिके हैं और बिकते रहेंगे। और गुलाम दूसरे बेचते हैं, मैं मालिक हूं, मैं खुद अपने को बेच रहा हूं। ये बेचारे चार गुलाम मेरे पीछे खड़े हैं। इनको पैसे की जरूरत है। तो किसी की हो हिम्मत मुझे खरीदने की तो खरीद ले!

वहां एक सन्नाटा हो गया। वह आदमी इतना मजबूत था कि उसे खरीदना भी सोचने की बात थी कि इसे खरीदना कि नहीं। कोई झंझट खड़ी करे, घर पहुंच कर कोई उपद्रव खड़ा करे, रास्ते में गर्दन दबा दे।

डायोजनीज ने कहा: मत डरो, जरा इन चार गुलामों की फिकर करो। ये बेचारे मीलों मेरे पीछे चल कर आए हैं। इनकी इतनी हिम्मत भी नहीं है कि ये कह सकें कि मुझे बेचना है। इनकी बोलती खो गई है। खरीद लो, बिलकुल घबड़ाओ मत। मैं किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा।

मालिकों ने कभी किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।

जिस आदमी को अपने भीतर का पता चल जाता है, उसे एक मालकियत मिल जाती है।

फिर उसके हाथों में जंजीरें भी हों, पैरों में बेड़ियां भी हों, तो भी तुम उसे गुलाम नहीं कह सकते।

तुम उसे मार सकते हो, लेकिन उसे गुलाम नहीं बना सकते।

तो जो लोग तुम्हारा वस्तुओं की तरह उपयोग करते हैं, वे दयनीय हैं। वे खुद अपना भी वस्तुओं की तरह उपयोग करते हैं।

यहां हर आदमी अपने को बेच रहा है, बड़े सस्ते में बेच रहा है।

और जब वह खुद अपने को बेच रहा है तो तुमको कैसे छोड़ेगा? वह तुमको भी बेचेगा। और खुद को बिकते देख कर दुख होता है। लेकिन इस दुख से कोई हल नहीं है।

सिर्फ एक ही बात इस परेशानी से तुम्हें मुक्त कर सकती है और वह है आत्मबोध–इस बात की अनुभूति कि आग मुझे जला नहीं सकती और तलवारें मुझे काट नहीं सकतीं।

फिर क्या हर्ज है कि तुम किसी के थोड़े काम आ गए? और वह नासमझ है कि उसने समझा कि उसने तुम्हारा उपयोग कर लिया। उसकी नासमझी उसके साथ, उसकी नासमझी उसका भाग्य, उसकी नासमझी उसकी नियति। लेकिन तुम्हारे लिए पीड़ित होने का कोई कारण नहीं है।

— कोंपलें फिर फूट आईं – Koplen Phir Phoot Aayeen by Osho click it to read for free on Kindle.

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