सूफ़ी नामा और राम नामा

सूफ़ी नामा में सूफ़ी कलाम के अन्तर्गत तुलसीदास का एक दोहा
सूफ़ी नामा की इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट

सूफ़ी नामा के इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट में इस दोहे का अर्थ बताने का कहा गया है। मैंने कुछ इस प्रकार अपना अर्थ पोस्ट किया। शायद यहाँ भी किसी के लिए मददगार साबित हो।

यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि तुलसीदास के राम धनुषधारी हैं, और कृष्ण को वह नमस्कार नहीं करते हैं क्योंकि हाथ में धनुष नहीं है। इसलिए मुझसे किसी बहुत ज़्यादा गहरे अर्थ की अपेक्षा नहीं करें तो बेहतर।

क्योंकि मैं तो उस राम की बात करूँगा जिसकी कबीर भी करते हैं, और नानक भी और जिसे मोहम्मद ‘वही है’ और नारद अपने भक्ति सूत्र में ‘त्वस्मिन’ यानी ‘उसके प्रति’ कहकर इशारा करते हैं। क्योंकि उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता।

और यहाँ तुलसीदास यह भी कह रहे हैं ‘दुहूँ दिसी तुलसीदास’ मतलब जैसे दूध देने वाले जानवर का पूरा दूध निकाल लिया जाता है वैसे अपने ज्ञान का पूरा निचोड़ essence कह रहे हैं तुलसीदास। तो राम का मतलब मैं जो कर रहा हूँ उसके संदर्भ में ही यहाँ बात की जा रही है।

धनुर्धारी राम के बारे में नहीं। अव्यक्त के बारे में चर्चा है यहाँ। हमारी आत्मा या रूह जो कि हमारा ही अव्यक्त रूप है उसको जानने का एक मात्र उपाय उसकी याद में रच बस जाना है।

संतों ने भी वही कहा है यहाँ भी कि जब तुम राम नाम की (उस अव्यक्त की) याद में इतने रत (लगातार undercurrent का बना रहना, इसका मतलब यह नहीं है कि रटते रहना। रत का मतलब है कि बीच बीच में भूल जाना क्योंकि संसार में रह रहे हो, परिवार, समाज, दुकान सब संभलना है लेकिन दिन में एक बार यह ख़्याल भी आ गया कि अरे मैं तो भूल गया! तो समझो ‘रत’ रहे यानी भीतर याद बनी हुई थी।

उस रत की कबीर ने सूरत कहा यानी वह याद जो शुभ है। ( प्रेयसी की भी याद बनी रहती है, और लोग उसको रत कहने लगें हों तो कबीर ने संशोधन किया) तो एक दिन सुर्ख़ रूह हो जाओगे, आत्म ज्ञान को प्राप्त हो जाओगे तभी इतना अटल विश्वास होगा अपने आप पर भी और राम पर भी क्योंकि उसकी इच्छा और इसकी रहमत के बग़ैर यह मुमकिन नहीं।

फिर सब अच्छे बुरे का भेद गिर जाएगा, सिर्फ़ मंगल ही रह जाएगा। फिर मान सम्मान या लांछन में कोई भेद नहीं रह जाएगा सिर्फ़ कुशल (यानी की जो हो उसका स्वीकार भाव) ही रह जाएगा। और जानकार के लिए मेरे bio में linktee पर जाएँ।

मेरे अनुभव से कुछ सुझाव:

समय के साथ, 20 वर्षों के भीतर, मैं अन्य कृत्यों के दौरान होंश या जागरूकता को लागू करने में सक्षम हो गया, जबकि मुझे बाद में एहसास हुआ कि कई कृत्यों में यह पहले ही स्वतः होने लगा था।

संपूर्णता के साथ जीना, जीवन को एक प्रामाणिक रूप में जीना यानी भीतर बाहर एक और ईमानदारी से जीना, लोगोंकी बिना भेदभाव के निःस्वार्थ भाव से सेवा करना और सभी बंधनों (धार्मिक, शैक्षिक, जाति, रंग आदि) से मुक्त होनातीन महत्वपूर्ण उत्प्रेरक हैं जो किसी को गहराई तक गोता लगाने में मदद करते हैं।

होंश का प्रयोग मेरे लिए काम करने का तरीका है, (instagram पर होंश) हो सकता है कि आपको भी यह उपयुक्तलगे अन्यथा अधिकांश लोगों के लिए गतिशील ध्यान है। लगभग 500 साल पहले भारतीय रहस्यवादी गोरखनाथद्वारा खोजी गई और ओशो द्वारा आगे संशोधित की गई 110 अन्य ध्यान तकनीकें हैं जिनका प्रयोग किया जा सकताहै और नियमित जीवन में उपयुक्त अभ्यास किया जा सकता है।

नमस्कार ….. मैं अपनी आंतरिक यात्रा के व्यक्तिगत अनुभवों से अपनी टिप्पणियाँ लिखता हूँ। इस पोस्ट में दुनिया भरके रहस्यवादियों की शिक्षाएँ शामिल हो सकती हैं जिन्हें मैं अपने अनुभव से तौलकर आज भी मानने लायक समझता हूँ। अधिकजानकारी के लिए और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ने के लिए, वेबसाइट https://linktr.ee/Joshuto पर एक नज़र डालें, या मेरे यूट्यूब चैनल  या पॉडकास्ट भी सुन सकते हैं। 

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