अहंकार का वीआर हेडसेट लगाकर देखने के कारण ही जीवन में भ्रांति है, अन्यथा यह महज़ एक खेल है

VR हेडसेट पहने एक महिला का चित्र पीछे नीले आकाश में सफ़ेद बादल भी दिखाई से रहे हैं। हमने अपने अहंकार को भी इसी तरह पहन रखा है।
अहंकार के VR हेडसेट से यह VR हेडसेट बेहतर है क्योंकि यह कोई ऐसी चीज है जिसको हम पहन सकते हैं और अपनी मर्ज़ी से उतार सकते हैं। हमको भी यह महसूस होता है कि हमने इसको पहन रखा है।अहंकार का VR हेडसेट तो ऐसा है कि हमको तो दिखाई ही नहीं देता, और ना हम इसको अपनी इच्छा से पहन या उतार सकते हैं। कोई धनी है तो धन उसका VR हेडसेट हो गया इत्यादि।
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सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहता हूँ कि बुद्ध ने कहा हैं “बुद्धमशरणम गच्छामी, संघम शरणम गच्छामी, धम्मम शरणम गच्छामी,“ इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को यदि ख़ुद कि सच्चाई या आत्मज्ञान को प्राप्त होना है तो पहली प्राथमिकता यह है कि वह किसी आत्मज्ञानी व्यक्ति के पास जाकर रहने लगे। दूसरी प्राथमिकता यह है कि यदि कोई बुद्ध या आत्मज्ञानी व्यक्ति निगाह में नहीं हो तो किसी बुद्ध के द्वारा स्थापित आश्रम में जाये, जिसमें ऐसे साधक मौजूद हों जिन्होंने कोई बुद्ध, जैसे ओशो, के साथ रहकर जीवन जीने वाले साधक मौजूद हों। यदि ऐसा कोई आश्रम निगाह में नहीं हो तो धर्म की शरण में जाये यानी किसी बुद्ध या आत्मज्ञानी किताबों में जो लिखा है उसको पढ़े और उसको जीवन में उतारकर स्व-अनुभव के आधार पर ज्ञान का विकास करता रहे।

तो मैंने फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, मीडियम और वर्ड प्रेस ब्लॉग philosia की मदद से पूरे विश्व में कोई 11 आत्मज्ञानी लोगों को खोजने में सफलता पायी है और अंतर्यात्रा पर कोई 100 से ज़्यादा लोगों को अच्छी स्थिति में पाया है। इसमें सारे continent आ गये हैं। अधिकतर आत्मज्ञानी लोग मुझे क्रिश्चियन ही मिले, दो मुस्लिम भी मिले।मेरे कांटैक्ट में जो हैं उनमें साधना में अच्छी स्थिति कोई 75% क्रिश्चियन लोगों की है और कुछ मुसलमान और बौद्ध भी हैं। यहाँ यह निष्कर्ष निकलता है कि पढ़ाई लिखाई और विज्ञान की सोंच बढ़ने से आध्यात्मिक ज्ञान की दिशा में बढ़ने में मदद मिलती है। इन सभी व्यक्तियों ने अपने धर्म को एक हाशिये पर रख रखा है, बस जितना उपयोगी लगा उतना ही उसको मानते हैं। बाक़ी धार्मिक रूढ़ियों, जो कि विज्ञान के कारण स्पष्ट दिखाई देती हैं, का वे सभी विरोध करते हैं चाहे किसी भी धर्म से हों।

उदाहरण के लिए हम यदि जीवन को इस रोलर कोस्टर राइड के समान समझें। और वह रोलर कोस्टर इसYouTube विडीओ में दिखाया गया है। यह सिर्फ़ बताने के लिए हैं कि यह कैसा होता है, और इससे संबंधित कुछ आगे बताया जाये तो आप उसे समझ सकें। मैंने अंग्रेज़ी में एक पोस्ट इसी विषय पर लिखा है ‘हम पहले से ही मेटावर्स में हैं, हमको इससे बाहर निकलने की आवश्यकता है’ जब फ़ेसबुक ने नाम बदलकर मेटा किया था।

तो हम सब एक ही संसार में रह रहे हैं लेकिन हमारे अनुभव तो बिल्कुल ही भिन्न होते हैं। यह सब सिर पर पहन रखे और माया की तरह हमारी आँखों को ढाँकने वाले हेडसेट की वजह से होता है, जैसा की इस Instagram पोस्ट में दिखाया गया है।

इसको हम ऐसा समझें जैसे हमने अपने प्रोफेशन का हेड सेट लगा रखा है। तो हमारे सारे अनुभव उसी के आधार पर बनते चले जाते हैं, और उसी को हम सत्य समझने लगते हैं और वैसा ही रियेक्ट हम करने लगते हैं, जैसा यहाँ यह खिलाड़ी कर रहे हैं । वह चिल्ला रहे हैं क्योंकि उनको ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वह उस बड़े झूले में बैठे हों, और वी आर हेडसेट उसको बग़ैर झूले में बैठे उसका अनुभव देता है जबकि उसे उसने ख़ुद ही पहना है, अपनी इस इच्छा से पहना है लेकिन अब चिल्ला रहे हैं। जबकि वहाँ सुनने वाला कोई है ही नहीं, कोई भगवान नहीं है बस भगवत्ता है। किंतु लोग हैं कि उसकी इस स्थिति का फ़ायदा उठाकर आपको सलाह देते हैं जैसा उसके आस पास के लोग कर रहे हैं, किंतु वे उसको उस स्थिति से निकाल नहीं सकते यह उनको भी पता है।उनको एहसास ही नहीं है कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं, किस स्थिति से गुजर रहे हैं।

अहंकार भी अलग अलग चेहरे हमको पहनने पर मजबूर कर देता है। नौकर ऐसे निकल जाता है, जैसे वह इंसान हो ही नहीं, और बड़ा ऑफिसर/बॉस या नेता के सामने हम ऐसे हो जाते हैं जैसे वह भगवान हो और वह हमको इंसान समझे ही नहीं। हमारी बहुत सारी पर्सनालिटी बन जाती है। हमारा प्रोफेशन या काम हमारी रोज़ी रोटी की व्यवस्था भर है, वह हम नहीं हैं। हमारा धर्म हमको सत्य की रह पर ले जा रहा है, लेकिन हम हिंदू या मुसलमान या सिख नहीं हैं। हम वह हैं जिसने गर्भ में पहली सांस ली। और जब शरीर से आख़िरी सांस निकलेगी उसके पहले हमारे सारे चेहरे उतारकर फिर से वही बना देगा क्योंकि जिसमें पहली सांस आयी थी, उसी से आख़िरी सांस भी बाहर निकलेगी।

ओशो का रंगीन चित्र ऊपरी आधे हिस्से में। नीचे उनका क्वोट “मत गवाँओं जीवन को! मत गवाँओ जनम को! उपयोग कर को। और क्या है उपयोग? मरौ हे जोगी मरौ! उपयोग एक ही है कि जीते जी तुम्हारे भीतर जो अहंकार है वह मर जाये, तो दृष्टि खुल जाये, आँख खुल जाए, द्वार मिल जाए। -आमी झरत, बिगसत् कँवल!
जीते जी अपने अहंकार को मार देना, अदृश्य VR हेडसेट उतार फेंकना ही असली मृत्यु है।और असली मनुष्य जीवन उसके बाद ही शुरू होता है।

हम अनंत हैं, और उससे कम से संतुष्ट हो जाना हमारे जीवन के अवसर को खो देने के समान है।

जबकि जीवन के सत्य हमको तब सही मायने में दिखाई देंगे जब हम अपने हेडसेट को उतारकर देखेंगे। क्योंकि हमारा हेडसेट हमारी सीमाओं का निर्माण कर देता है। हमारा धर्म, हमारी राष्ट्रीयता, हमारा प्रदेश, हमारा शहर, हमारा समाज, हमारी शिक्षा, हमारा शिक्षा का संस्थान इत्यादि इन सब सीमाओं से बंधा हमारा व्यवसाय, काम धंधा यह सब मिलकर हमारे हेडसेट का निर्माण करते हैं। और फिर उसके कारण ही परेशान होते हैं, चिल्लाते हैं अपने को बचाने की पुकार लगाते हैं जबकि वह सब हमारा ही प्रक्षेपण है। हमारा ही बुना हुआ जाल है। और उससे हम मुक्त हो सकते हैं।

हम हमारे अपने जीवन को हम ठीक वैसे ही महसूस करते हैं, रीऐक्ट करते हैं जैसे की यहाँ वर्चूअल रीऐलिटी का हेड सेट पहने व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं।

और जब हम किसी दूसरे को सलाह देते हैं तो हम उसके लिए बिना हेड्सेट पहने व्यक्ति हो जाते हैंउसके बाहरीरीऐक्शन के आधार पर उसको सलाह देते हैं, जैसा कि खेल रहे व्यक्ति के साथी उसके साथ कर रहे हैं, जबकि उसकी ‘उस समय की’ आंतरिक स्थिति को हम बिल्कुल नहीं समझ पाते हैं।

हम सभी हेड सेट पहने हुए हैं और अलग अलग तरह की वर्चूअल रीऐलिटी की राइड पर जीवन जी रहे हैं। जबकि reality में हम बिलकुल ही ही उससे परे हैं, वह हम हैं ही नहीं।जैसा की हम यहाँ इस व्यक्ति की स्थिति देखकर समझ सकते हैं। खेल के बाहर जो लोग हैं उन सबकी स्थिति, उन सबका अनुभव एक समान है। ठीक उसी प्रकार सारे संत जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त किया वे सब यही कहते आये हैं कि वह एक ही है।

ज्ञानी वह है जिसने अपने वर्चूअल रीऐलिटी के हेड सेट को उतार कर फेंक दिया हैया कहें कि किसी क्षण कुछ ऐसा घटा कि हमारा हेडसेट बीच खेल में छिटक कर निकल गया। क्योंकि हम अपने अहंकार की फेंक भी नहीं सकते क्योंकि फेंकने वाले के रूप में हम मौजूद ही रहेंगे। इसलिए हम ध्यान या प्रार्थना जो कि रटी रटाई नहीं बल्कि अहोभाव से भरपूर पर्सनल प्रार्थना हो के माध्यम से हम बस ऐसी स्थिति निर्मित कर सकते हैं कि अहंकार अपने से गिर जाये। के  और उस समय हम तुरंत जान जाते हैं कि जो हम देख रहे थे वह सत्य नहीं था। और जो हमने अब देखा है वह ही एकमात्र सत्य है, जिसके बारे में संतों ने कहा है। उसके साथ ही जितना समय हमने वर्चूअल रीऐलिटी खेल में जो जो भी किया वह एक पल में झूठ हो जाताहै। जब खेल हो झूठ हो गया तो खेलने वाला कैसे सत्य होगा। वह हम राइड पर थे ही नहींवह खेल था जो हम खिलाड़ी की तरह खेल रहे थे। इसमें उतार चढ़ाव भी उतने ही नक़ली थेदुःख भी नक़ली थे और सुख भी नक़ली थे।उसके कारण जिनको हमने पाप या पुण्य समझ रखा था वे भी तुरंत असत्य हो जाते हैं। वे सब खेल के ही अंग थे, और खेल से बाहर आने के लिए उन सबने अपना काम किया। लेकिन उनका कोई असर अब नहीं रहा।  

और अब यदि फिर से हेडसेट पहना दिया जाए तो आपके रीऐक्शन बदल जाएँगे। आप अब उसे खेल की तरह लेंगे। उसके सुख, उसके दुख अब आपको पहले की तरह छू भी नहीं पाएँगे। यह है आत्मज्ञान के बाद की स्थिति। 

ओशो कहते हैं:- तुम्हारे भीतर कुछ है, जिसे मिटा कर भी नहीं मिटाया जा सकता है। (जिसे जानकर सारे डर ख़त्म हो जाते हैं )

बोली खुदसर हवा

एक जर्रा है तू
यूं उड़ा दूंगी मैं,

मौजे-दरिया बढ़ी

बोली मेरे लिए एक तिनका है तू
यूं बहा दूंगी मैं,

आतिशेत्तुंद की (भीषण आग)
इक लपट ने कहा,

मैं जला डालूंगी

और जमीं ने कहा

मैं निगल जाऊंगी

मैंने चेहरे से अपने उलट दी निकाब (यानी अहंकार का वी आर हेडसेट)

और हंसकर कहा–मैं सुलेमान हूं

इब्ने-आदम  हूं  मैं,  यानी  इंसान  हूं

मिटा-मिटाकर भी मिटा न पाओगे। (मेरी हस्ती को)

सत्य मिटता नहीं, छिप जाए; (शरीर मरकर) फिर-फिर उभर आएगा।

न तो हवा मिटा सकती है, न आग।
न दरिया मिटा सकता है, न जमीन लील सकती है, न आकाश पोंछ सकता है।

मैंने चेहरे से अपने उलट दी निकाब

और हंसकर कहा–मैं सुलेमान हूं
इब्ने-आदम  हूं  मैं,  यानी  इंसान  हूं

हताश नहीं होते हैं। इसलिए यूं न कहो कि “क्या हमारा अंधकार कभी न कटेगा?’ ( या हमारा अहंकार कभी ना मिटेगा?)

दीए की जरा सी ज्योति भी पुराने से पुराने अंधकार को, गहन से गहन अंधकार को, अमावस की रात को तोड़ देती है।

सवाल अंधकार का नहीं है, सवाल दीए के जलाने का है।

उसी श्रम में हम लगे हैं। और यह सौभाग्य का श्रम है।

इसमें पुरस्कार अलग नहीं है–श्रम में ही समाया हुआ है।- ओशो, पीवत राम रस लगी खुमारी, प्रवचन #4

सत्य जानने के बाद ( भीतर की आँख के खुल जाने के बाद या भीतर दिये के जल जाने के बाद) जीवन में कोई बदलाव नहीं आताआपके रिएक्शन  बदलकर response हो जाते हैं। हर बार एक जैसी स्थिति होगी तो भी आपका response अलग होगा क्योंकि समय अब वह नहीं हैस्थान अब वहीं नहीं है। जबकि पहले समय या स्थिति कुछ भी हो हमारा रीऐक्शन बिल्कुल रोबोट की तरह वही रहता था। 

ओशो का बाहें फैलाकर कुर्सी पर  बैठे हुए का चित्र और ऊपर ब्लैक एंड व्हाईट में उनका क्वोट “तुम्हें एक बहुत ऊँचे नियम का पता नहीं कि अस्तित्व उनकी सुरक्षा करता है जो सत्य की खोज में हैं।
जब हम अपने अहंकार का VR हेडसेट उतारने की हिम्मत दिखाते हैं तो सबसे पहला कदम सत्य की खोज में उठाते हैं। और सारा अस्तित्व हमारी सुरक्षा में जुट जाता है। यह मेरा भी अनुभव है और बड़े आश्चर्यजनक तरीक़ों से हमारी सुरक्षा करता है जब हम जान बूझकर असुरक्षित होने के लिए साहस जुटाते हैं।

हम हेडसेट उतारने की दिशा में प्रयत्न कर सकते हैं, लेकिन एकदम उतारकर नहीं फेंक सकते। सहज ध्यान या awareness meditation का प्रयोग जीवन में हमको इस कार्य में बहुत मदद करता है। उसके लिया बस हमको किसी एक काम को करते समय पूरे ध्यान से, उस काम को कई छोटे छोटे टुकड़े में बाँटकर उसके एक एक हिस्से को भीतर की आँख से देखते हुए करना है। उसके हर अनुभव को पूरा महसूस करना है। बस इतनी सी शुरुआत समय के साथ बाक़ी सब अपने आप कर देगी।

ओशो कहते हैं :-

“असाधारण (बिना हेडसेट पहने) हो तुम।

तुमने समझा होगा, कंकड़-पत्थर हो। और कंकड़-पत्थर तुम नहीं हो। कंकड़-पत्थर हैं ही नहीं अस्तित्व में। अस्तित्व केवल हीरों से बना है।

इसलिए पहली तो इस भ्रांति को अपने मन में जगह मत देना कि तुम सामान्य हो। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अहंकार को आरोपित करना। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अपने को दूसरों से असामान्य समझना।

मैं यह कह रहा हूं कि असामान्य होना जगत का स्वभाव है। तुम असामान्य हो, ऐसा नहीं; यहां सभी कुछ असामान्य है।

यहां सामान्य होने की सुविधा ही नहीं है। और इस विरोधाभास को ठीक से समझना–क्योंकि तुमने अपने को सामान्य समझ रखा है, इसलिए तुम असामान्य होने की बड़ी चेष्टा करते हो–धन से, पद से, प्रतिष्ठा से।

अहंकार की खोज ही यही है कि (बचपने से वयस्कता में प्रवेश करते समय) मान तो लिया है तुमने कि तुम सामान्य हो–और सामान्य होने में पीड़ा होती है, चुभता है कांटा, मन राजी नहीं होता–तो (वी आर हेडसेट पहनकर) तुम असामान्य होने का ढोंग करते हो; जब कि मजा यह है कि तुम असामान्य हो, इसके ढोंग की कोई भी जरूरत नहीं।

इसलिए जिन्होंने यह जान लिया कि असामान्य हैं, वे तो अहंकार को छोड़ ही देते हैं तत्क्षण। अब जरूरत ही न रही।

ऐसा समझो कि हीरा है, और हीरे ने समझ रखा है कि कंकड़-पत्थर है।

कंकड़-पत्थर समझ रखा है, इसलिए अपने को सजाता है कि हीरा दिखाई पड़े। कंकड़-पत्थर होने को कौन राजी है।

तो हीरा अपने को कंकड़-पत्थर मान कर सजाता है, रंग-रोगन करता है कि कोई जान न ले कि मैं कंकड़-पत्थर हूं।

लेकिन जिस दिन यह पहचान पाएगा कि मैं हीरा था ही, उसी दिन कंकड़ होने की भ्रांति भी मिट जाएगी और स्वयं को सजाने की आकांक्षा भी मिट जाएगी।

वह कंकड़-पत्थर की भ्रांति की ही छाया थी। उस दिन विनम्रता का जन्म होता है।

जिस दिन तुम जानते हो कि तुम असामान्य हो, उसी दिन असामान्य होने की दौड़ मिट जाती है; जिस दिन तुम जान लेते हो कि तुम असाधारण हो… क्योंकि अन्यथा होने का उपाय नहीं।

परमात्मा के हस्ताक्षर हैं तुम पर। रोएं-रोएं पर उसका गीत लिखा है। रोएं-रोएं पर उसके हाथों के चिह्न हैं। क्योंकि उसने ही तुम्हें बनाया है। वही तुम्हारी धड़कनों में है। वही तुम्हारी श्वास में है। सामान्य तुम नहीं हो। अगर सामान्य होते तो धर्म का फिर कोई उपाय नहीं।

फिर ‘अथातो’ का बिंदु कभी आएगा ही नहीं। अगर तुम सामान्य ही होते तो कैसे परमात्मा की ज्योति तुममें प्रज्वलित होगी?

तब कैसे तुम जागोगे और कैसे तुम बुद्ध बनोगे?

असंभव है फिर। नहीं, तुम बन पाते हो बुद्ध, तुम जागते हो, तुम समाधिस्थ हो पाते हो–क्योंकि वह तुम्हारा स्वभाव है। जब तुम नहीं जानते थे तब भी तुम वही थे। जानने भर का फर्क पड़ता है; अस्तित्व तो सदा एकरस है।

कोई जान लेता है, कोई बिना जाने जीए जाता है। ज्ञान और अज्ञान का ही भेद है। अस्तित्व में जरा भी भेद नहीं है। तुममें और बुद्ध में रत्ती भर भेद नहीं है। जहां तक अस्तित्व का संबंध है।

लेकिन बुद्ध ने लौट कर अपने को देख लिया, तुमने लौट कर अपने को नहीं देखा। तुम भिखारी बने हो, बुद्ध सम्राट हो गए हैं।

जिसने अपने को लौट कर देख लिया, वह सम्राट हो गया। सम्राट तो सभी थे; कुछ को याद आ गई; खबर आ गई, सुराग मिल गया; कुछ को खबर ही न मिली; कुछ भिखारी ही बने हुए सम्राट बनने की चेष्टा में लगे रहे।

तुम जो बनने की चेष्टा कर रहे हो, वह तुम हो। यही तो संदेश है सारे धर्म का। तुम जिसे खोज रहे हो उसे तुमने कभी खोया नहीं, केवल विस्मरण किया है।”

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यदि इतने से ध्यान से आपको चार या छह माह में अ-मनी ( नो माइंड या विचार शून्य स्थिति) अवस्था का अनुभव ना हो तो आपको डायनामिक मैडिटेशन या झेन मैडिटेशन भी साथ में करने से सफलता मिल सकती है। संसार में रहते हुए अमनी नो-माइंड स्थिति भी प्राप्त कर ली तो बहुत बड़ा काम कर लिया आपने। हमारा धर्म, हमारी राष्ट्रीयता, हमारा प्रदेश, हमारा शहर, हमारा समाज, हमारी शिक्षा, हमारा शिक्षा का संस्थान इत्यादि सीमाएँ धीरे धीरे अपने से गिरने लगेंगी। कुछ सीमाएँ ख़ुद से त्यागनी पड़ेंगी।

लाओ त्जु, चीन का महान संत जिसने ‘ताओ थे चिंग’ लिखी, ने कहा है कि पहले जल के समान हो जाओ, क्योंकि वही कठिन तपस्या है। फिर जल तो बड़ी बड़ी चट्टान को भी तोड़ देता है। जल सिर्फ़ महिलाओं की तरह दिखने में ही कोमल और कमजोर ही नहीं हैं, बल्कि उनकी तरह चट्टानों को धूल में मिलाने में सक्षम है।

समय के साथ, 20 वर्षों के भीतर, मैं अन्य कृत्यों के दौरान होंश या जागरूकता को लागू करने में सक्षम हो गया, जबकि मुझे बाद में एहसास हुआ कि कई कृत्यों में यह पहले ही स्वतः होने लगा था।

संपूर्णता के साथ जीना, जीवन को एक प्रामाणिक रूप में जीना यानी भीतर बाहर एक और ईमानदारी से जीना, लोगोंकी बिना भेदभाव के निःस्वार्थ भाव से सेवा करना और सभी बंधनों (धार्मिक, शैक्षिक, जाति, रंग आदि) से मुक्त होनातीन महत्वपूर्ण उत्प्रेरक हैं जो किसी को गहराई तक गोता लगाने में मदद करते हैं।

होंश का प्रयोग मेरे लिए काम करने का तरीका है, (instagram पर होंश) हो सकता है कि आपको भी यह उपयुक्तलगे अन्यथा अधिकांश लोगों के लिए गतिशील ध्यान है। लगभग 500 साल पहले भारतीय रहस्यवादी गोरखनाथद्वारा खोजी गई और ओशो द्वारा आगे संशोधित की गई 110 अन्य ध्यान तकनीकें हैं जिनका प्रयोग किया जा सकताहै और नियमित जीवन में उपयुक्त अभ्यास किया जा सकता है।

नमस्कार ….. मैं अपनी आंतरिक यात्रा के व्यक्तिगत अनुभवों से अपनी टिप्पणियाँ लिखता हूँ। इस पोस्ट में दुनिया भरके रहस्यवादियों की शिक्षाएँ शामिल हो सकती हैं जिन्हें मैं आज भी मानने लायक समझता हूँ। मेरे बारे में अधिकजानकारी के लिए और मेरे साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ने के लिए, मेरे सोशल मीडिया लिंक से जुड़ने केलिए वेबसाइट https://linktr.ee/Joshuto पर एक नज़र डालें, या मेरे यूट्यूब चैनल की सदस्यता लें और/यापॉडकास्ट आदि सुनें।

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