तर्कवादी लोग संगठित धर्म और स्वधर्म के बीच त्रिशंकु ना होकर, आगे बढ़ें

तर्कशील अड्डा द्वारा फ़ेसबुक पर पोस्ट किया बुद्ध का एक क्वोट की किसी बात को सिर्फ़ इसलिए मत मान लेना क्योंकि वह धर्म या शास्त्र के नाम पर प्रचारित किया गया है।-अत्त दीपो भव। इस क्वोट में संगठित धर्म पर चोंट तो की है,लेकिन स्वधर्म के लिए या अपने दीपक ख़ुद बनने के लिए होंश का प्रयोग भी ज़रूरी है।
तर्कवादी या नास्तिक लोगों को यह जानना ज़रूरी है कि संगठित धर्म पर बुद्ध ने यहाँ चोंट तो की है,लेकिन स्वधर्म के लिए या अपने दीपक ख़ुद बनने के लिए जो होंश का प्रयोग उन्होंने सुझाया है उसे जीवन में प्रयोग करना भी ज़रूरी है।यह जानना हर उस व्यक्ति के लिए ज़्यादा ज़रूरी है तभी भीतर का दिया जलेगा।जो संगठित धर्म को अपने जीवन से विदा कर चुका है।

अंग्रेज़ी में स्वतंत्र पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाने माने द न्यूज़ मिनट से लेकर गूगल ट्रांसलेट की मदद से हिन्दी में अनुवादित रिपोर्ट “इस्लामिक कानूनों और इस्लामोफोबिया के बीच फंसा: केरल में एक पूर्व-मुस्लिम होना”

न्यूज़ रिपोर्ट लिंक पर उपलब्ध है। 

इस खबर पर मेरे विचार और ऐसे पूर्व-मुस्लिम या पूर्व-ईसाई या पूर्व-हिंदू जो नास्तिक होकर जीवन जीने को अपनी स्वतंत्रता समझते हैं, उनको कुछ सुझाव इस पोस्ट के माध्यम से बताना चाहता हूँ:-

यह बताना मैं ज़रूरी समझता हूँ कि अनंत या पूर्ण स्वतंत्रता की तरफ़ यह उनका एक साहसिक कदम है। और इसे उस स्थिति को प्राप्त करने के पहले संतोष नहीं करना चाहिए। 

मेरा मानना है कि लोगों को यह जानना भी ज़रूरी है कि अभी आधा रास्ता ही तय किया गया है। आधा अभी भी बाक़ी है। क्योंकि किसी भी धर्म के विरोध में खड़े व्यक्ति को भी खड़े रहने का सहारा तो वह धर्म ही देता है

जैसे दुश्मन की मौत होने पर व्यक्ति जल्दी मर जाता है क्योंकि उसकी दुश्मनी के सहारे वह जी रहा था। उसकी दुश्मनी जीवन ऊर्जा का भी कारण थी। ठीक वैसे ही नास्तिक लोगों को जो छूट गया उसके बारे में सोंचना ही नहीं चाहिए।

ओशो कहते हैं “मनुष्य जीवन सत्य या ईमान की खोज के लिए मिला है। जहां कहीं भी कोई नया विचार या संदेश नज़र आये उसको तत्काल अपने जीवन में उतरकर उसकी जाँच करना चाहिए, और उसके परिणामों के आधार पर ही उसे सत्य या असत्य मानना चाहिए। इस प्रकार एक एक करके सारे वाद, संदेश आदि जाँचने से जो बच रहेगा वह ही सार्वभौम सत्य होगा। हर व्यक्ति अंत में उसे हो पाएगा। लेकिन यदि हमने पहले ही उसे पकड़ लिया तो यह भी सिर के बल खड़ा धर्म ही होगा।”

मेरी राय में हर व्यक्ति को scientific subjective research की राह लेना चाहिए।साइंस ऑब्जेक्टिव रिसर्च पर आधारित हैं और विज्ञान के कारण ही नास्तिकता को इतनी जगह मिल पायी है। लेकिन अभी सारे प्रयोग बाहरी ही हुए हैं और उससे खोज और प्रयोग करने की विधि ज़रूर हम सीख गये हैं लेकिन उसको खोज को ख़ुद पर भी आरोपित करने के बाद और ईश्वर को नहीं पाने के बाद ही कहा जा सकता है कि ईश्वर नहीं है।

इसलिए ख़ुद पर प्रयोग जारी रखना चाहिए जब तक कि जब तक ख़ुद का सत्य प्राप्त नहीं होता।ऑब्जेक्टिव रिसर्च हमको बस उधार के सत्य से परिचित करवा देती है।

पूरी न्यूज़ रिपोर्ट लिंक पर अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। यह खबर मुसलमानों के धर्म छोड़ने पर आधारित है लेकिन करीबी क़रीब यही स्थिति हर धर्म जो शिक्षा को बढ़ावा देता है उसपर भी लागू होती है इसलिए इसके सिर्फ़ कुछ हिस्से जो ज़रूरी है उनको यहाँ हिन्दी में प्रस्तुत है:- 

“ऐसे सदस्य भी हैं जिन्होंने वैज्ञानिक कारणों से धर्म छोड़ दिया है। समूह के सदस्य और एनआरसी के संस्थापक आरिफ़ हुसैन का कहनाहै कि वैज्ञानिक स्वभाव अपनाने के कारण उन्हें होम्योपैथी (जिसका उन्होंने पहले अभ्यास किया था) छोड़नी पड़ी, साथ ही उनका धर्म भीछोड़ना पड़ा। “हमें रोका गया और कहा गया कि तर्क और विज्ञान को धर्म के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए। दूसरी ओर, वे यह भीकहने का प्रयास करते हैं कि इस्लाम वैज्ञानिक है। जब मैंने इन चीजों का गहराई से अध्ययन किया, तो मुझे एहसास हुआ कि जिनचीजों के वैज्ञानिक होने का दावा किया जाता है, उनमें से ज्यादातर अवैज्ञानिक हैं, ”आरिफ कहते हैं।

सदस्यों का कहना है कि केरल में ऐसे समूह होने का कारण यहां उपलब्ध उच्च शिक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। लियाक्कथबताते हैं कि केरल में धर्म की आलोचना करने वालों के खिलाफ हमले हुए हैं लेकिन ये काफी कम हैं।

धर्म 

पूर्व मुसलमान बच्चों के खतना जैसी अन्य प्रथाओं के खिलाफ भी लड़ते हैं। “हम इन्हें मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखते हैं, नकि केवल धार्मिक प्रथाओं के रूप में। इस तरह हमने इसे सक्रियता के रूप में लिया और यह एक पूर्व-मुस्लिम आंदोलन बन गया, ”आरिफ कहते हैं।

धार्मिक प्रथाओं में परिवर्तन

ईएमयू के सदस्यों का कहना है कि भले ही इंटरनेट ने ऐसे समूह बनाना और चर्चा के लिए जगह बनाना संभव बना दिया है, लेकिन पिछलेकुछ दशकों में धार्मिक प्रथाएं सख्त हो गई हैं। आयशा उन परिवर्तनों में से कुछ का श्रेय वहाबी संस्कृति को देती है जो प्रवासी मलयालीपश्चिम एशिया से वापस लाए थे। “इससे पहले, महिलाएं वही पहनती थीं जो उनके लिए आरामदायक और सुलभ हो – जैसे काचियुमकुप्पयवुम (मुंडू और ब्लाउज)। लेकिन अब ‘एक मुस्लिम’ का विचार प्रचारित किया जा रहा है, जहां दुनिया भर के मुसलमानों कोकिताब के अनुसार एक विशेष तरीके से रहना है,” आयशा कहती हैं।

सफिया का कहना है कि अलाप्पुझा के जिस मुस्लिम स्कूल में वह गई थी, वहां उनके समय में बहुत सी लड़कियां हिजाब या शॉल सेअपना सिर ढकती नहीं थीं, लेकिन अब उसी स्कूल में पढ़ने वाली उनकी बेटी के लिए यह अनिवार्य है। “मेरा मानना ​​है कि 1992 मेंबाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद केरल में मुसलमान अधिक असुरक्षित महसूस करने लगे और धार्मिक प्रथाओं का अधिक तीव्रता सेपालन करने लगे। मेरे कॉलेज के दिनों या यहाँ तक कि मेरी माँ के दिनों में भी ऐसा नहीं था – जब मेरी मौसी कॉलेज में साड़ी या पैंट औरशर्ट पहनती थीं, जैसा कि वे उस समय की हिंदी फिल्मों में देखा करती थीं,” सफ़िया याद करती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि कम से कम 70 के दशक से, ऐसे तर्कवादी या स्वतंत्र विचार वाले समूह रहे हैं जो धर्म को अलग तरह से देखतेहैं, विशेष रूप से मुसलमानों के लिए नहीं। ऐसे शुरुआती समूहों में से एक केरल युक्तिवादी संघम (केरल रेशनलिस्ट एसोसिएशन) हैजिसमें ऐसे तर्कवादी लोग शामिल थे जिन्होंने इस्लाम सहित अन्य धर्म छोड़ दिए और जनता के बीच तर्कसंगत विचारों को फैलाने की कोशिशकी। हमसे बात करने वाले अब्दुल अली सदस्य रह चुके हैं. केरल के सबसे प्रसिद्ध तर्कवादियों में से एक, जोसेफ एडमारुकु, अपनेअंतिम वर्षों में राष्ट्रपति थे। एक अन्य तर्कवादी और इस्लाम के जाने-माने आलोचक ईए जब्बार 70 के दशक में इस समूह में शामिलहुए।

“उन दिनों, समूह मुस्लिम मुद्दों को ज्यादा नहीं उठाता था। यहां तक ​​कि गैर-मुस्लिम तर्कवादी भी इस्लाम की आलोचना करने से डरतेथे। उन दिनों अब्दुल अली, उस्मान कोया – चेरनूर के एक डॉक्टर, और मैंने एक साथ काम करना शुरू किया,” जब्बार कहते हैं. उन वर्षोंमें बहुत कम लेकिन तर्कवादी मुसलमान तर्कसंगत समूहों में शामिल हुए थे, और जो शामिल भी हुए, वे शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से सामने आए।हम छोटे-छोटे कार्यक्रम और बातचीत करेंगे और लेख लिखेंगे जो लोगों तक पहुंचेंगे। बैठकों के बारे में संदेश पोस्टकार्ड के माध्यम सेभेजे जाएंगे। बहुत धीरे-धीरे, अधिक लोग हमारे साथ जुड़ने लगे,” जब्बार कहते हैं।

 

फिर भी, ऐसे लोगों का एक वर्ग है जो इस्लाम छोड़कर संघ की धुन पर खेलते हैं और कभी-कभी इसके लिए भुगतान भी करते हैं।आयशा और केरल के पूर्व मुसलमानों में से अन्य लोग किसी भी तरह से हिंदुत्व दक्षिणपंथ के साथ नहीं होने के बारे में खास हैं।

जब्बार का कहना है कि इस्लामोफोबिया के ऐसे मामले उन दबावों की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आ सकते हैं, जिनका सामना उन्हें धर्मछोड़ने पर करना पड़ा होगा। “यह उन लोगों से आता है जिन्होंने व्यक्तिगत या भावनात्मक कारणों से धर्म छोड़ दिया है। लेकिन यह हममेंसे उन लोगों के लिए अलग है जिनके सामाजिक कारण भी हैं। कभी-कभी यह दूसरे चरम तक चला जाता है जहां वे संघ परिवार कीताकतों से जुड़ जाते हैं। मैं इसकी निंदा नहीं करता।”

एक समूह के रूप में, केरल के पूर्व मुसलमान मुस्लिम विरोधी नहीं हैं, लेकिन मुसलमानों और इस्लाम के बीच एक अंतर है, सफ़िया याददिलाती हैं। वह कहती हैं, ”हम मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि विचारधारा के ख़िलाफ़ बोलते हैं।” उन्हें यकीन है कि ऐसे कईमुसलमान हैं जो धर्म छोड़ना चाहते हैं लेकिन सामाजिक, वित्तीय और अन्य निहितार्थों के कारण ऐसा नहीं कर सकते। जब्बार कहते हैंकि केरल में इतने सारे लोगों को धर्म छोड़ने या ऐसे समूह बनाने का कारण यहां के लोगों की स्वतंत्र सोच, शैक्षिक और वैज्ञानिक स्वभावसे जुड़ा होना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि केरल में यह सब आसान रहा है. पारंपरिक व्याख्या के विपरीत, कुरान को सही ढंग से पढ़ने की वकालत करने वालेधर्मनिरपेक्ष इस्लामवादी चेकन्नूर मौलवी 1993 में रहस्यमय तरीके से गायब हो गए, और कई लोग मानते हैं कि उनकी हत्या कर दी गईथी। वह ऊपर वर्णित खुरान सुन्नत सोसायटी के संस्थापक थे। खुद जब्बार को एक से अधिक बार पीटा गया था. और सोशल मीडियापर नये युग के तर्कवादियों पर हमले किये जाते हैं। सफ़िया कहती हैं, “लेकिन कभी-कभी हमारे ख़िलाफ़ सभी भाषण – और समूह केगठन के समय उनमें से कई थे – समूह के बारे में बात फैलाने में मदद करते हैं और अधिक लोग हमारे बारे में जानते हैं।”

12 इस्लामिक देशों में धर्म छोड़ने पर मौत की सजा हो सकती है लेकिन भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और कानून इसकी इजाजत नहींदेता. लियाक्कथ कहते हैं, “केवल, आप एक सामाजिक बहिष्कृत बन जाएंगे।” इसके बावजूद, अधिक लोग, हालांकि कभी-कभीसोशल मीडिया पर नकली पहचान के माध्यम से, अब अपने विश्वास की कमी के बारे में मुखर हो रहे हैं।”

TNM news इनपुट- अज़ीफ़ा फातिमा

 

ओशो का सुझाया प्रयोग जो मैंने अपने जीवन में प्रयोग करके देखा और यह मेरे लिये आश्चर्यजनक परिणाम दायक रहा, ज़रूरी नहीं की यह आपके लिए भी लाभदायक रहे लेकिन जीवन में प्रयोग करते रहने की शुरुआत ही सबसे कठिन काम है। फिर कुछ समय में कोई ऐसा प्रयोग मिल ही जाता है जो तुरंत प्रभाव देने लगता है। बस उसे रोज़ करते रहो चाहे २ मिनट ही सही। बाक़ी अपने आप होता जाता है, और मंज़िल मिलती ज़रूर है। यहाँ कोई ख़ाली हाथ नहीं जाता, जब कोई इतना सबकुछ दाँव पर लगता है तो अस्तित्व उनकी रक्षा करता है।

साक्षी का प्रयोग

साक्षी का प्रयोग शुरु करना होता है शरीर को चलते हुएबैठे हुएबिस्तर पर जाते हुए,

या खाते हुए देखने से!

स्थूलतम चीजों से व्यक्ति को शुरु करना चाहिए,

क्योंकि यह सरल है। और फिर उसे सूक्ष्म अनुभवों की ओर जाना चाहिए — विचारों को देखना शुरु करना चाहिए।

और जब व्यक्ति विचारों को देखने में कुशल हो जाता है, तो उसे अनुभूतियों को देखना शुरु करना चाहिए। जब तुम्हें लगे कि तुम अपनीअनुभूतियों को भी देख सकते हो, तो फिर अपनी भाव-दशाओं को देखना शुरु करो, जो कि अनुभूतियों से अधिक सूक्ष्म भी हैं, और स्पष्टभी।

द्रष्टा होने का चमत्कार यह है कि जब तुम शरीर को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा अधिक मजबूत होता है। जब तुम अपने विचारों को देखतेहो, तो तुम्हारा द्रष्टा और भी मजबूत होता है। और जब अनुभूतियों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा फिर और मजबूत होता है। जब तुमअपनी भाव-दशाओं को देखते हो, तो द्रष्टा इतना मजबूत हो जाता है कि स्वयं बना रह सकता है — स्वयं को देखता हुआ, जैसे किअंधेरी रात में जलता हुआ एक दीया न केवल अपने आस-पास प्रकाश करता है, बल्कि स्वयं को भी प्रकाशित करता है!

लेकिन लोग बस दूसरों को देख रहे हैं, वे कभी स्वयं को देखने की चिंता नहीं लेते। हर कोई देख रहा है — यह सबसे उथले तल परदेखना है — कि दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है, दूसरा व्यक्ति क्या पहन रहा है, वह कैसा लगता है। हर व्यक्ति देख रहा है — देखने कीप्रक्रिया कोई ऐसी नई बात नहीं है, जिसे तुम्हारे जीवन में प्रवेश देना है। उसे बस गहराना है — दूसरों से हटाकर स्वयं की आंतरिकअनुभूतियों, विचारों और भाव-दशाओं की ओर करना है — और अंततः स्वयं द्रष्टा की ओर ही इंगित कर देना है।

लोगों की हास्यास्पद बातों पर तुम आसानी से हंस सकते हो, लेकिन कभी तुम स्वयं पर भी हंसे हो? कभी तुमने स्वयं को कुछ हास्यास्पदकरते हुए पकड़ा है? नहीं, स्वयं को तुम बिलकुल अनदेखा रखते हो — तुम्हारा सारा देखना दूसरों के विषय में ही है, और उसका कोईलाभ नहीं है।

अवलोकन की इस ऊर्जा का उपयोग अपने अंतस के रूपांतरण के लिए कर लो। यह इतना आनंद दे सकती है, इतने आशीष बरसासकती है कि तुम स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। सरल सी प्रक्रिया है, लेकिन एक बार तुम इसका उपयोग स्वयं पर करने लगो, तो यहएक ध्यान बन जाता है।

किसी भी चीज को ध्यान बनाया जा सकता है!

अवलोकन तो तुम सभी जानते हो, इसलिए उसे सीखने का कोई प्रश्न नहीं है, केवल देखने के विषय को बदलने का प्रश्न है। उसे करीबपर ले आओ। अपने शरीर को देखो, और तुम चकित होओगे।

अपना हाथ मैं बिना द्रष्टा हुए भी हिला सकता हूं, और द्रष्टा होकर भी हिला सकता हूं। तुम्हें भेद नहीं दिखाई पड़ेगा, लेकिन मैं भेद कोदेख सकता हूं। जब मैं हाथ को द्रष्टा-भाव के साथ हिलाता हूं, तो उसमें एक प्रसाद और सौंदर्य होता है, एक शांति और एक मौन होताहै।

तुम हर कदम को देखते हुए चल सकते हो, उसमें तुम्हें वे सब लाभ तो मिलेंगे ही जो चलना तुम्हें एक व्यायाम के रूप में दे सकता है, साथही इससे तुम्हें एक बड़े सरल ध्यान का लाभ भी मिलेगा।

ओशो 

ध्यानयोगप्रथम और अंतिम मुक्ति

समय के साथ, 20 वर्षों के भीतर, मैं अन्य कृत्यों के दौरान होंश या जागरूकता को लागू करने में सक्षम हो गया, जबकि मुझे बाद में एहसास हुआ कि कई कृत्यों में यह पहले ही स्वतः होने लगा था।

संपूर्णता के साथ जीना, जीवन को एक प्रामाणिक रूप में जीना यानी भीतर बाहर एक और ईमानदारी से जीना, लोगोंकी बिना भेदभाव के निःस्वार्थ भाव से सेवा करना और सभी बंधनों (धार्मिक, शैक्षिक, जाति, रंग आदि) से मुक्त होनातीन महत्वपूर्ण उत्प्रेरक हैं जो किसी को गहराई तक गोता लगाने में मदद करते हैं।

होंश का प्रयोग मेरे लिए काम करने का तरीका है, (instagram पर होंश) हो सकता है कि आपको भी यह उपयुक्तलगे अन्यथा अधिकांश लोगों के लिए गतिशील ध्यान है। लगभग 500 साल पहले भारतीय रहस्यवादी गोरखनाथद्वारा खोजी गई और ओशो द्वारा आगे संशोधित की गई 110 अन्य ध्यान तकनीकें हैं जिनका प्रयोग किया जा सकताहै और नियमित जीवन में उपयुक्त अभ्यास किया जा सकता है।

नमस्कार ….. मैं अपनी आंतरिक यात्रा के व्यक्तिगत अनुभवों से अपनी टिप्पणियाँ लिखता हूँ। इस पोस्ट में दुनिया भरके रहस्यवादियों की शिक्षाएँ शामिल हो सकती हैं जिन्हें मैं आज भी मानने लायक समझता हूँ। मेरे बारे में अधिकजानकारी के लिए और मेरे साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ने के लिए, मेरे सोशल मीडिया लिंक से जुड़ने केलिए वेबसाइट https://linktr.ee/Joshuto पर एक नज़र डालें, या मेरे यूट्यूब चैनल की सदस्यता लें और/यापॉडकास्ट आदि सुनें।

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