भक्त को तो पता ही नहीं होता कि वह भक्ति कर रहा है।

मेरे अनुभव से भक्त को बस यह एहसास होता है कि वह जो कर रहा है वह सही कर रहा है।उसको यह तो पता ही नहीं होता कि वह भक्ति कर रहा है। यह तो उसको तब पता चलता है जब उसको ईश्वर दर्शन देता है।

उसका तो पूरा ध्यान सही करने पर होता है और उसको मन में एक भरोसा होता है कि यदि वह अपने काम से खुश है, सहजता से कर रहा है, तटस्थ होकर कर रहा है, उसे अपना धर्म मानकर कर रहा है और सही कर रहा है तो एक ना एक दिन उसकी ईश्वर दर्शन कि असंभव अभीप्सा भी पूरी होगी। उसको लगातार इस बात का भान होता है कि मैं उसकी निगाह में कहीं नीचा नहीं गिर जाऊँ और जब जब ऐसा होता है कि कुछ ग़लत हो गया तो अपनी भूल स्वीकारता है और वह फिर फिर बेहतर करने का प्रयत्न करता रहता है। उसका अपनी निगाह में गिरना भी उसको मंज़ूर नहीं होता।उसकी भीतर की निगाह ही उसकी सबकुछ होती है।

कभी उसके सारे प्रयत्न बेकार साबित होते हैं, तब वह ठिठक जाता है। उसको यह एहसास होता है कि ‘वह ग़लत है’। और वह सबकुछ जो आज तक किया उसको शून्य घोषित करता है, व्यर्थ का प्रयत्न स्वीकार करता है और एक नयी शुरुआत करता है जिसमें वह कुछ है ही नहीं। और पुकारता है कि अब तेरे किए ही कुछ हो सकता है मेरे किया सब व्यर्थ गया।

अब वह चाहे ध्यान भी करता है तो भी वह भक्ति ही कर रहा है, प्रार्थना ही कर रहा है। और मेरा अनुभव कहता है कि आज के संसार में सिर्फ़ भक्ति से कुछ प्राप्त नहीं होने वाला, क्योंकि संसार को छोड़कर आप कहीं जा ही नहीं सकते।और आज के संसार में रहना अपने आप में एक तपस्या से कम नहीं है। परिवार, समाज और प्रोफेशन मेंतालमेल बिठाकर बच्चों को भी सम्भालना, उनकी परवरिश और सोशल मीडिया के साथ जीवन में पल पल पर संघर्ष से कोई अछूता कैसे रह सकता है।

तो मेरे अनुभव से इस रोज़ की भागदौड़ को सहज ध्यान या awareness meditation के द्वारा भक्ति रूपांतरित किया जा सकता है। संसार में रहकर संसार से तटस्थ रहने के लिए ध्यान अनिवार्य है।और भक्ति तथा ध्यान इन दो पंखों के सहारे हम बड़ी सरलता से ईश्वर दर्शन जैसे असंभव को संभव बना सकते हैं।

तब यही जीवन भक्ति में रूपांतरित हो सकता है। तब संसार में सभी की सेवा पूरे हृदय से बिना भेदभाव से करके, अपने आपको अपने कार्य में ईमानदारी से पूरा समर्पित करके और कथनी और करनी में कोई भेद नहीं रखकर अर्थात् सबके सामने एक ही चेहरा, एक ही व्यक्तित्व (authentic living) से व्यवहार करके हम भक्ति ही कर रहे हैं।

भक्ति के बारे में नारद के भक्ति सूत्र पर प्रवचन देते हुए ओशो कहते हैं:-

जब तक परमात्मा ने ही तुम्हें खोजना शुरू न कर दिया हो, तुम्हारे मन में उसे खोजने की बात ही न उठेगी। यह बात बड़ी विरोधाभासी लगेगी, लेकिन बड़ा गहन सत्य है। 

परमात्मा को केवल वे ही लोग खोजने निकलते हैं जिनको परमात्मा ने खोजना शुरू कर दिया। जो उसके द्वारा चुन ही लिए गए हैं, वे ही केवल उसे चुनते हैं। 

जो किसी भांति उनके हृदय में आ ही गया है, वे ही उसकी प्रार्थना में तत्पर होते हैं। तुम्हारे भीतर से वही उसको खोजता है। सारा खेलउसका है। 

तुम जहां भी इस खेल में कर्ता बन जाते हो, वहीं बाधा खड़ी हो जाती है, वहीं दरवाजे बंद हो जाते हैं। तुम खाली रहो, उसे ही खोजने दो तुम्हारे भीतर से, तो तत्क्षण इस क्षण भी उस महाक्रांति का आविर्भाव हो सकता है। 

भक्ति को समझने में, इस बात को जितना गहराई से समझ लो, उतना उपयोगी होगा:

 भक्ति परमात्मा की खोज नहीं है; भक्ति परमात्मा के द्वारा मनुष्य की खोज है। 

मनुष्य हार कर समर्पण कर देता है, थक कर समर्पण कर देता है, पराजित होकर झुक जाता है–कहता है: अब तू ही उठा तो उठा! अब तू ही सम्हाल तो सम्हाल! अब अपने से सम्हाला नहीं जाता! जो मैं कर सकता था, किया; जो मैं हो सकता था, हुआ–लेकिन मेरे किए कुछभी नहीं हो पाता! मेरा किया सब अनकिया हो जाता है। 

जितना सम्हालता हूं उतना ही गिरता हूं। जितनी कोशिश करता हूं कि ठीक राह पर आ जाऊं, उतना ही भटकता हूं। अब तू ही चला! जन्मतेरा है, जीवन तेरा है, मौत तेरी है–प्रार्थना मेरी कैसे होगी?

भक्ति ऐसे है जैसे छोटा बच्चा पुकारता है, रोता है और मां दौड़ी चली आती है। भक्ति बस तुम्हारा रुदन है! तुम्हारे हृदय से उठी आह है!

भक्ति तुम्हारे आंसुओं की अभिव्यक्ति है। तुम कहीं जाते नहीं, तुम जहां हो वहीं ठिठक कर रह जाते हो। एक सत्य तुम्हारी समझ में आ जाता है कि ‘तुम ही बस गलत हो’; तुम गलत करते हो, ऐसा नहीं।

भक्त कहता है: मैं बिलकुल तैयार नहीं हूं। 

इसलिए मेरी तरफ से तो कोई मांग हो नहीं सकती। इतना ही कह सकता हूं कि पाप करने में मैंने कोई कमी न की थी! 

मुझसे बुरा आदमी खोजे न मिलेगा। 

जैसे मैंने पाप करने में कमी न की–क्योंकि पाप ही मैं कर सकता था, और मैं कर क्या सकता था–अब तू करुणा में कमी मत करना, क्योंकि तू करुणा ही कर सकता है, और तू कर क्या सकेगा! 

भक्त अपने को अपात्र घोषित करता है–यही उसकी पात्रता है; असफल घोषित करता है–यही उसकी सफलता है; हारा हुआ घोषित करता है–यही उसकी विजय है। 

भक्त कहे, ऐसा भी जरूरी नहीं है। 

बायजीद प्रार्थना नहीं करता था जाकर मस्जिद में। 

जीवन तो उसका अनूठा था, परमात्मा के प्रेम में पगा था! किसी ने पूछा कि प्रार्थना करने मस्जिद क्यों नहीं जाते, तो वह रोने लगा। 

और उसने कहा: एक बार मैं एक शहर से गुजरता था और एक सम्राट के द्वार पर मैंने एक भिखारी को खड़े देखा। 

सम्राट द्वार से बाहर आ रहा था, ठिठका, और उसने भिखारी से पूछा: क्या चाहते हो, बोलते क्यों नहीं? 

उस भिखारी ने कहा: अगर मुझे देख कर तुम्हें दया नहीं आती तो मेरी बात सुन कर भी क्या फर्क पड़ेगा! 

उसके फटे-पुराने कपड़े हैं, चीथड़े की तरह लटके हैं। शरीर ढंका नहीं है उन कपड़ों से। उससे तो नंगा भी होता तो भी ज्यादा ढंका होता।पेट सिकुड़ कर पीठ से लग गया है, हड्डियां निकल आई हैं। आंखें धंस गई हैं। 

तो बायजीद ने कहा: उसी दिन से मैंने प्रार्थना करनी बंद कर दी। 

क्या कहना है उससे? उस फकीर ने कहा, उस भिखमंगे ने कहा: अगर मुझे देख कर तुझे दया नहीं आती तो बात खत्म हो गई, अब कहना क्या है और! 

मेरी तरफ देख! (बस वह देख भर ले इतना काफ़ी है)

लबे-इजहार की जरूरत क्या, आप हूं मैं अपने दर्द की फरियाद। 

जरूरी नहीं है कि भक्त प्रार्थना करे। 

भक्त की तो एक भाव-दशा है: ‘आप हूं मैं अपनी फरियाद।’ 

उसके तो होने में ही उसकी दीनता समाई है। 

नारद अनूठी बात कहते हैं: ‘ईश्वर को अभिमान से द्वेष और दैन्य से प्रियभाव है।’ 

नहीं, ईश्वर को क्या द्वेष होगा और क्या प्रियभाव होगा! 

लेकिन भक्त की तरफ जब तक अहंकार है तब तक परमात्मा प्रवेश नहीं कर सकता। (तुम्हारे अहंकार से द्वेषभाव है)

भक्त की तरफ जब दैन्यभाव आ जाता है–‘ आप हूं अपनी फरियाद’–जब सब तरफ हारा हुआ भक्त खड़ा हो जाता है; जब उसके पूरे जीवन की एक ही भावदशा रह जाती है कि मैं पराजित हूं, दीन हूं, पतित हूं, पापी हूं, अपात्र हूं, मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके कारण तेरी मांग करूं; मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके कारण तेरे लिए दावेदार बनूं; मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है कि तेरे लिए शिकायत करूं–उसी क्षण, इस दैन्यभाव में परमात्मा उतर आता है। 

जीसस का वचन है कि ‘जो आत्मा से दरिद्र हैं, (poor in spirit) पुअर इन स्पिरिट, उन्हीं को परमात्मा का मिलन होता है।’ 

सोचें, ध्यान करें इस पर: आत्मा से दरिद्र, पुअर इन स्पिरिट! 

शरीर से दरिद्र होना बहुत आसान है। 

तुम घर छोड़ दो, मकान छोड़ दो, परिवार छोड़ दो, वस्त्र त्याग दो, नग्न खड़े हो जाओ; लेकिन जितना तुम बाहर छोड़ते जाओगे, उतनी ही भीतर अकड़ बड़ी होती जाएगी। तो बाहर से तो तुम दरिद्र हो जाओगे, भीतर बड़ी अकड़ हो जाएगी। 

जैन मुनियों को देखो! जैन मुनि किसी को हाथ जोड़ कर नमस्कार नहीं कर सकता; वह नियम के विपरीत है। वह सिर्फ आशीर्वाद दे सकता है, नमस्कार नहीं कर सकता। 

क्यों? 

क्योंकि वह त्यागी है। त्यागी और नमस्कार करे, भोगियों को! असंभव है! 

तो यह आत्मा की दरिद्रता न हुई। ऊपर से भला इसने दरिद्र का भेष पहन लिया हो, दो जोड़ी कपड़े रखता हो, कुछ और इसके पास नहो, भिक्षा मांगकर जीता हो–लेकिन इसकी अकड़ तो देखो! यह भिखारी नहीं है। 

इसके भिखमंगेपन में बड़ा अहंकार है। मैंने इतना त्यागा है…! 

तो अगर तुम जैन मुनि को नमस्कार करो तो वह आशीर्वाद दे देता है, हाथ नहीं जोड़ सकता तुम्हें। 

जीसस ने कहा: आत्मा की दरिद्रता! … तो यह तो बाहर का धन छोड़ कर भीतर का धन पकड़ लिया; यह तो बाहर का अहंकार छोड़ कर भीतर का अहंकार पकड़ लिया; यह तो पाना न हुआ, खोना हो गया उलटा; यह तो पहुंचना न हुआ, मंजिल से और दूरी हो गई। 

ध्यान रखना, पहले तुम बाहर की दुनिया में धनी होने की कोशिश करते हो; जब वहां हार जाते हो तो तुम भीतर की दुनिया में धनी होनेकी कोशिश करने लगते हो। 

तुम्हारा योग, तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा कर्म, फिर तुम्हें भीतर धनी बनाने लगते हैं। 

तो तुम चूकते ही चले जाते हो। बाहर का धन इतना खतरनाक है तो भीतर का धन तो और भी खतरनाक होगा। बाहर की अकड़ इतनी बुरी है तो भीतर की अकड़ तो और भी बुरी होगी। 

परमात्मा तुम्हारे परम दैन्यभाव में उतरता है। 

इस सूत्र को गलत मत समझ लेना। परमात्मा को तुम्हारे दैन्यभाव से प्रेम नहीं है; लेकिन तुम्हारे दैन्यभाव में ही उतरना हो सकता है। 

जब तुम भरे ही हुए हो (जैसे पहाड़ की तरह ऊँचे हो, तो पानी का ठहरना नहीं हो सकता) तो परमात्मा के उतरने का कोई सवाल नहीं है।(तब वह भरे किसको, तुम valley की तरह ख़ाली हो तो वह उतरे और भरे) जब तुम ही अकड़े हुए हो और तुम सोचते हो, तुम ही सम्हाले हुए हो सब, तुम ही कर रहे हो सब तो तुमने उसे इनकार ही कर दिया–तुमने उसके लिए द्वार ही बंद कर लिए।”

भक्त की बड़ी अनूठी दुनिया है! अलग ही उसका लोक है–गणित का नहीं, विज्ञान का नहीं, तर्क का नहीं–प्रेम का, प्रार्थना का, परमात्मा का। वहां सभी कुछ उलटा है। वहां बीज के पहले फल है। वहां मार्ग के पहले मंजिल है। वहां तुम्हारे करने से कुछ भी नहीं होता–तुम्हारे न करने से सब हो जाता है। इसलिए जिनको भी अकड़ना हो, भक्ति उनके लिए नहीं है; जिनको पिघलना हो, उनके लिए है।

— भक्ति सूत्र , #७ योग और भोग का संयोग है भक्ति – Bhakti Sutra by Osho .


मेरे अनुभव से कहता हूँ, लड़खड़ाकर जो गिरें तो लेकिन बस इतना भर भी होंश रहा कि साक़ी यानी ईश्वर के चरणों में गिर पड़ें तो भक्ति अपने मुक़ाम पर पहुँच जाती है। क्योंकि यह साधारण भक्ति को पराभक्ति में रूपांतरित कर देती है।

लेकिन लड़खड़ाकर गिरते समय भी होंश तभी रहेगा जब जीवन में होंश को साधा होगा। जीवन को जागकर जीने का अन्दाज़ उस गिरने की घड़ी के आने के पहले जीवन में उतार लिया होगा। और उसके लिए साक्षी का प्रयोग शुरु करना होता है शरीर को चलते हुए, बैठे हुए, बिस्तर पर जाते हुए,

या खाते हुए देखने से!

स्थूलतम चीजों से व्यक्ति को शुरु करना चाहिए,

क्योंकि यह सरल है। और फिर उसे सूक्ष्म अनुभवों की ओर जाना चाहिए — विचारों को देखना शुरु करना चाहिए।

और जब व्यक्ति विचारों को देखने में कुशल हो जाता है, तो उसे अनुभूतियों को देखना शुरु करना चाहिए। जब तुम्हें लगे कि तुम अपनीअनुभूतियों को भी देख सकते हो, तो फिर अपनी भाव-दशाओं को देखना शुरु करो, जो कि अनुभूतियों से अधिक सूक्ष्म भी हैं, और स्पष्टभी।

द्रष्टा होने का चमत्कार यह है कि जब तुम शरीर को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा अधिक मजबूत होता है। जब तुम अपने विचारों को देखतेहो, तो तुम्हारा द्रष्टा और भी मजबूत होता है। और जब अनुभूतियों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा फिर और मजबूत होता है। जब तुमअपनी भाव-दशाओं को देखते हो, तो द्रष्टा इतना मजबूत हो जाता है कि स्वयं बना रह सकता है — स्वयं को देखता हुआ, जैसे किअंधेरी रात में जलता हुआ एक दीया न केवल अपने आस-पास प्रकाश करता है, बल्कि स्वयं को भी प्रकाशित करता है!

लेकिन लोग बस दूसरों को देख रहे हैं, वे कभी स्वयं को देखने की चिंता नहीं लेते। हर कोई देख रहा है — यह सबसे उथले तल परदेखना है — कि दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है, दूसरा व्यक्ति क्या पहन रहा है, वह कैसा लगता है। हर व्यक्ति देख रहा है — देखने कीप्रक्रिया कोई ऐसी नई बात नहीं है, जिसे तुम्हारे जीवन में प्रवेश देना है। उसे बस गहराना है — दूसरों से हटाकर स्वयं की आंतरिकअनुभूतियों, विचारों और भाव-दशाओं की ओर करना है — और अंततः स्वयं द्रष्टा की ओर ही इंगित कर देना है।

लोगों की हास्यास्पद बातों पर तुम आसानी से हंस सकते हो, लेकिन कभी तुम स्वयं पर भी हंसे हो? कभी तुमने स्वयं को कुछ हास्यास्पदकरते हुए पकड़ा है? नहीं, स्वयं को तुम बिलकुल अनदेखा रखते हो — तुम्हारा सारा देखना दूसरों के विषय में ही है, और उसका कोईलाभ नहीं है।

अवलोकन की इस ऊर्जा का उपयोग अपने अंतस के रूपांतरण के लिए कर लो। यह इतना आनंद दे सकती है, इतने आशीष बरसासकती है कि तुम स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। सरल सी प्रक्रिया है, लेकिन एक बार तुम इसका उपयोग स्वयं पर करने लगो, तो यहएक ध्यान बन जाता है।

किसी भी चीज को ध्यान बनाया जा सकता है!

अवलोकन तो तुम सभी जानते हो, इसलिए उसे सीखने का कोई प्रश्न नहीं है, केवल देखने के विषय को बदलने का प्रश्न है। उसे करीबपर ले आओ। अपने शरीर को देखो, और तुम चकित होओगे।

अपना हाथ मैं बिना द्रष्टा हुए भी हिला सकता हूं, और द्रष्टा होकर भी हिला सकता हूं। तुम्हें भेद नहीं दिखाई पड़ेगा, लेकिन मैं भेद कोदेख सकता हूं। जब मैं हाथ को द्रष्टा-भाव के साथ हिलाता हूं, तो उसमें एक प्रसाद और सौंदर्य होता है, एक शांति और एक मौन होताहै।

तुम हर कदम को देखते हुए चल सकते हो, उसमें तुम्हें वे सब लाभ तो मिलेंगे ही जो चलना तुम्हें एक व्यायाम के रूप में दे सकता है, साथही इससे तुम्हें एक बड़े सरल ध्यान का लाभ भी मिलेगा।

ओशो 

ध्यानयोगप्रथम और अंतिम मुक्ति

समय के साथ, 20 वर्षों के भीतर, मैं अन्य कृत्यों के दौरान होंश या जागरूकता को लागू करने में सक्षम हो गया, जबकि मुझे बाद में एहसास हुआ कि कई कृत्यों में यह पहले ही स्वतः होने लगा था।

संपूर्णता के साथ जीना, जीवन को एक प्रामाणिक रूप में जीना यानी भीतर बाहर एक और ईमानदारी से जीना, लोगोंकी बिना भेदभाव के निःस्वार्थ भाव से सेवा करना और सभी बंधनों (धार्मिक, शैक्षिक, जाति, रंग आदि) से मुक्त होनातीन महत्वपूर्ण उत्प्रेरक हैं जो किसी को गहराई तक गोता लगाने में मदद करते हैं।

होंश का प्रयोग मेरे लिए काम करने का तरीका है, (instagram पर होंश) हो सकता है कि आपको भी यह उपयुक्तलगे अन्यथा अधिकांश लोगों के लिए गतिशील ध्यान है। लगभग 500 साल पहले भारतीय रहस्यवादी गोरखनाथद्वारा खोजी गई और ओशो द्वारा आगे संशोधित की गई 110 अन्य ध्यान तकनीकें हैं जिनका प्रयोग किया जा सकताहै और नियमित जीवन में उपयुक्त अभ्यास किया जा सकता है।

नमस्कार ….. मैं अपनी आंतरिक यात्रा के व्यक्तिगत अनुभवों से अपनी टिप्पणियाँ लिखता हूँ। इस पोस्ट में दुनिया भरके रहस्यवादियों की शिक्षाएँ शामिल हो सकती हैं जिन्हें मैं आज भी मानने लायक समझता हूँ। मेरे बारे में अधिकजानकारी के लिए और मेरे साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ने के लिए, मेरे सोशल मीडिया लिंक से जुड़ने केलिए वेबसाइट https://linktr.ee/Joshuto पर एक नज़र डालें, या मेरे यूट्यूब चैनल की सदस्यता लें और/यापॉडकास्ट आदि सुनें।

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