निरोध को उपलब्ध व्यक्ति पका हुआ व्यक्ति है – ओशो

डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित ओशो के नारद सूत्र पर प्रीति प्रवचन पर किताब भक्ति सूत्र का मुख्य पृष्ठ जिसपर ओशो का फोटो है
निरोध स्वरूपा है भक्ति इसको आप ओशो की जिस किताब में पढ़ सकते हैं उसकी हार्ड कॉपी का मुख्य पृष्ठ का चित्र। डायमंड बक्स द्वारा प्रकाशित यह किताब आपकी भक्ति को अनंत ऊँचाइयों पर, प्रीति तक पहुँचाए  इसी कामना के साथ। सूत्र पर ओशो के प्रीति प्रवचन का कुछ अंश प्रस्तुत है। कभी ओशो ने यहाँ प्रीति शब्द क्यों उपयोग किया है इसपर भी चर्चा करेंगे।यह बड़ा सुंदर और बहुमूल्य शब्द है।

नारद कहते हैं :-

‘वह भक्ति कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधस्वरूपा है।’

‘निरोधस्वरूपा!’ साधारणतः भक्ति-सूत्र पर व्याख्या करने वालों ने निरोधस्वरूपा का अर्थ किया है कि जिन्होंने सब त्याग दिया, छोड़ दिया।

नहीं, मेरा वैसा अर्थ नहीं है।

जरा सा फर्क करता हूं, लेकिन फर्क बहुत बड़ा है। समझोगे तो उससे बड़ा फर्क नहीं हो सकता।

निरोधस्वरूपा का अर्थ यह नहीं है कि जिन्होंने छोड़ दिया, निरोधस्वरूपा का अर्थ है कि जिनसे छूट गया। (जैसे कोई बच्चा रंगीन पत्थर इकट्ठे करके मुट्ठी में बांधकर रखता है क्योंकि उनको वह बहुमूल्य समझता है, उनको ही वह हीरा समझता है और जब उसको कोई असली हीरा दिखाता है कि इसको हीरा कहते हैं तब उसके हाथ से पत्थर छूट ही जाते हैं। उनको छोड़ने का प्रयत्न भी नहीं करना पड़ता।उसको तो पता ही नहीं चलता कब छूट गये! तब हुआ निरोध जैसे तुम्हारा शरीर दर से काँप रहा है और मौत सामने दिखाई पड़ती हो या तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ सुखों का भोग कर रहे हों और अचानक नींद खुल जाये तो तुमको कुछ त्यागना नहीं पड़ता, सत्य का उद्घाटन होते ही असत्य छूट जाता है वह निरोध)

निरोध और त्याग का वही फर्क है।

त्याग का अर्थ होता है: छोड़ा। निरोध का अर्थ होता है: छूटा, व्यर्थ हुआ।

जो चीज व्यर्थ हो जाती है उसे छोड़ना थोड़े ही पड़ता है, छूट जाती है। सुबह तुम रोज घर का कूड़ा-करकट इकट्ठा करके बाहर फेंक आतेहो तो तुम कोई जाकर अखबारों के दफ्तर में खबर नहीं देते कि आज फिर त्याग कर दिया कूड़े-करकट का, ढेर का ढेर त्याग कर दिया!

तुम जाओगे (अख़बार के दफ़्तर विज्ञापन देने) तो लोग तुम्हें पागल समझेंगे।

अगर कूड़ा-करकट है तो फिर छोड़ा, इसकी बात ही क्यों उठाते हो?

तो जो आदमी कहता है, ‘मैंने त्याग किया’, वह आदमी अभी भी निरोध को उपलब्ध नहीं हुआ।

क्योंकि त्याग करने का अर्थ ही यह होता है कि अभी भी सार्थकता शेष थी। 

अगर कोई कहता है कि मैंने बड़ा स्वर्ण छोड़ा, बड़े महल छोड़े; गौर से देखना: स्वर्ण अभी भी स्वर्ण था, महल अभी भी महल थे। ‘छोड़ा!’ छोड़ना बड़ी चेष्टा से हुआ। चेष्टा का अर्थ ही यह होता है कि रस अभी कायम था; फल पका न था, कच्चा था, तोड़ना पड़ा। 

(पीला भी नहीं बल्कि) पका फल गिरता है; कच्चा फल तोड़ना पड़ता है। (कच्चे फल में अभी रस बह रहा था पेड़ से फल की तरफ़ और फल भी और की माँग कर रहा था। जब फल को पेड़ जो देना था सब दे चुका अब कुछ शेष नहीं है, और फल की भी कोई माँग नहीं तो वह अपनी डाल से उसको रस भेजना बंद कर देता है जैसे की वह अब वहाँ है ही नहीं, तब फल कुछ ही समय में गिर जाता है और ना तो पेड़ को इसका पता चलता है कि वह गिर गया और ना फल को। इसी प्रकार संसार से अभी हमें कुछ मिलने की उम्मीद है तो संसार रूपी वृक्ष से हमारी तरफ़ रस बह रहा है। जब हम पक जाएँगे तभी वह रस बहना बंद होगा। हमारी तरफ़ से कमी है कि रस बह रहा है इसलिए निरोध को उपलब्ध नहीं हुई है भक्ति, अभी कच्ची है।) 

तो त्यागी तो सभी कच्चे हैं।

निरोध को उपलब्ध व्यक्ति पका हुआ व्यक्ति है। 

ओशो के नारद सूत्र पर प्रवचन पर डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब का अंतिम पृष्ठ। इस पर ओशो का एक क्वोट लिखा है।
थोड़ा हृदय को ऊपर उठाओ, काम को प्रेम और प्रेम को भक्ति बनाओ।-ओशो

त्याग और निरोध का यही फर्क है। नारद कह सकते थे, ‘त्यागस्वरूपा है’, पर उन्होंने नहीं कहा। 

‘निरोधस्वरूपा!’ व्यर्थ हो गई जो चीज, वह गिर जाती है, उसका निरोध हो जाता है। 

सुबह तुम जागते हो तो सपनों का त्याग थोड़े ही करते हो, कि जाग कर तुम कहते हो कि ‘बस, रात भर के सपने छोड़ता हूं।’ जागे कि निरोध हुआ।

जागते ही तुमने पाया कि संसार में रहते सपने टूट गए; सपने व्यर्थ हो गए; सपने सिद्ध हो गए कि सपने थे, बात समाप्त हुई; अब उनकी चर्चा क्या करनी है।

जो त्याग का हिसाब रखते हैं, समझना, भोगी ही हैं–शीर्षासन करते हुए, उलटे खड़े हो गए हैं, भोगी ही हैं।-ओशो, नारद भभक्ति सूत्र – Bhakti Sutra by Osho . #10 परम मुक्ति है भक्ति
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कॉपीराइट © ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन, इस प्रवचन की एक एमपी 3 ऑडियो फ़ाइल को OSHO.com से डाउनलोड किया जा सकता है या आप पूरी पुस्तक को OSHO लाइब्रेरी में ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। OSHO की कई पुस्तकें Amazon.com और Viha Osho बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स से ऑनलाइन यू.एस. में उपलब्ध हैं। भारत में वे Amazon.in से भी उपलब्ध हैं।  

मेरे अनुभव :-

समय के साथ, 20 वर्षों के भीतर, मैं अन्य कृत्यों के दौरान होंश या जागरूकता को लागू करने में सक्षम हो गया, जबकि मुझे बाद में एहसास हुआ कि कई कृत्यों में यह पहले ही स्वतः होने लगा था।

संपूर्णता के साथ जीना, जीवन को एक प्रामाणिक रूप में जीना यानी भीतर बाहर एक और ईमानदारी से जीना, लोगोंकी बिना भेदभाव के निःस्वार्थ भाव से सेवा करना और सभी बंधनों (धार्मिक, शैक्षिक, जाति, रंग आदि) से मुक्त होनातीन महत्वपूर्ण उत्प्रेरक हैं जो किसी को गहराई तक गोता लगाने में मदद करते हैं।

होंश का प्रयोग मेरे लिए काम करने का तरीका है, (instagram पर होंश) हो सकता है कि आपको भी यह उपयुक्तलगे अन्यथा अधिकांश लोगों के लिए गतिशील ध्यान है। लगभग 500 साल पहले भारतीय रहस्यवादी गोरखनाथद्वारा खोजी गई और ओशो द्वारा आगे संशोधित की गई 110 अन्य ध्यान तकनीकें हैं जिनका प्रयोग किया जा सकताहै और नियमित जीवन में उपयुक्त अभ्यास किया जा सकता है।

ओशो इंटरनेशनल ऑनलाइन (ओआईओ) इन्हें आपके घर से सीखने की सुविधा प्रदान करता है, ओशो ध्यान दिवस अंग्रेज़ी में @यूरो 20.00 प्रति व्यक्ति के हिसाब से। OIO तीन टाइमज़ोन NY, बर्लिन औरमुंबई के माध्यम से घूमता है। आप अपने लिए सुविधाजनक समय के अनुसार प्रीबुक कर सकते हैं।

नमस्कार ….. मैं अपनी आंतरिक यात्रा के व्यक्तिगत अनुभवों से अपनी टिप्पणियाँ लिखता हूँ। इस पोस्ट में दुनिया भरके रहस्यवादियों की शिक्षाएँ शामिल हो सकती हैं जिन्हें मैं आज भी मानने लायक समझता हूँ। मेरे बारे में अधिकजानकारी के लिए और मेरे साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ने के लिए, मेरे सोशल मीडिया लिंक से जुड़ने केलिए वेबसाइट https://linktr.ee/Joshuto पर एक नज़र डालें, या मेरे यूट्यूब चैनल की सदस्यता लें और/यापॉडकास्ट आदि सुनें।

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