There is no other.

a human being if one is just living in heard mentality by regurgitating what religion, society, education taught as one’s own knowledge about ‘self’ then that person cannot be hold in God’s arms. Only the one who dares to explore inner REALITY from one’s own experience could be.

घणा दिन सो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

इस देश के आध्यात्मिक यात्रा पर किए अनुसंधान इतने गहरे गए हैं कि कहीं और इस जगत में उसकी बराबरी नहीं है। सत्य हमेशा नएनए रूप में जगत के सामने आता रहेगा यह उसका स्वभाव है। यदि जिनके ऊपर इसके अनुसंधान की ज़िम्मेदारी है वे जब जब भी अपनीज़िम्मेदारी से च्युत होंगे, सत्य अपने को प्रकट कहीं और से करने लगेगा।

It is spring after all!

You are the seed from which the tree of your ‘self’ is ready to evolve as soon as the seed is ready to sacrifice its outer cover (here the ego and desires are the outer cover of that seed) and then dare to jump into the unknown ie darkness (rooting in soil) and keep learning, unlearning and relearning by practicing meditation ie growth of roots. Then it is sure that one day the first glimpse of light becomes visible to its stem.

जो कर्ता में अकर्ता, और अकर्ता में कर्ता को देखता है। वही देखता है।

जो कर्ता में अकर्ता, और अकर्ता में कर्ता को देखता है। वही देखता है। गीता के एक श्लोक पर आधारित है यह. बचपन में अंधे और लंगड़े की पढ़ी कहानी को इसके माध्यम से आध्यात्मिक यात्रा के लिए उपयोगी बताने का प्रयास किया है ।

द्रोपदि का आधुनिक चीरहरण

पुराने जमाने में स्त्री को ज्ञान प्राप्ति नहीं हो सकती थी, लेकिन मीरा, राबिया, दयाबाई इत्यादि ने साबित कर दिया कि जीसस के ज्ञानप्राप्ति के बाद से धर्म की यात्रा में अब समाज का निम्न वर्ग और स्त्री दोनों ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, और कई कर भी चुके।

ऐसी भक्ति करे रैदासा।

रैदास की शिष्या, मीरा, के कृष्ण से मिलन की यात्रा को आज के परिदृश्य में बताने का प्रयत्न किया है। वह परमात्मा हमारा स्वरूप ही है, लेकिन यात्रा की भारी भरकम क़ीमत जो चुकाने को तैयार है उसे ही मिलता है। नाथद्वारा मैं आज भी मीरा का मंदिर है जो इस घटना का प्रमाण है। इसलिए उसे तोड़ा नहीं गया, पूरे मंदिर का पुनर्निर्माण कर दिया गया। वही उस मंदिर का केंद्र है।

हर शरीर में रामायण या महाभारत घट रही है प्रतिक्षण।

महाभारत मेरी नज़र से। मानव शरीर को मैंने पाँच पांडवों और कौरवों के घटनाक्रम का स्टेज पर नाटक के रूपांतरण के रूप में प्रस्तुत किया है। आध्यात्मिक दृष्टि से इस महाकाव्य की रचना क्यों की गयी होगी यह बताने का प्रयास किया है

You are God*

*T&C apply.  Terms and Conditions: You should not be searching for God, because God can remain present as a God or the seeker. Instead of searching keep practicing meditation, as little as possible or as much as possible as per situation that day. God is always here and now. You in present moment, without your past … Continue reading You are God*

घर वापसी

भारत में जो ब्राह्मण हैं वे अपने आपको ‘अनपढ़ ब्राह्मण’ मानकर ब्रह्मज्ञान की बजाय बाक़ी सारे काम में कुशल होने को पूर्ण ब्राह्मण होनेकी पहली पायदान मानते हैं।  भारत के सभ्रांत वर्ग ने  ब्रह्म ज्ञान जो सबसे महत्वपूर्ण है, उसे तो एक तरफ़ रख दिया और उसको छोड़कर बाक़ी सारे रास्तों पर विश्व गुरुहोने का सपना संजोए है। येन केन प्रकारेन चाहे ज़ोर ज़बरदस्ती और भय से ऐन हिंदू धर्म को बचाने में लगा हुआ है। जबकि मनुष्य सेधर्म है ना कि धर्म से मनुष्य। लाओ त्ज़ु ने कहा है कि जब धर्म में ज़ोर ज़बरदस्ती होने लगे तो यह उसके अंत समय की निशानी है, जैसेदिया बुझने से पहले सभी बचा खुचा तेल एकसाथ खींचकर बड़ी तेज ज्योति का साथ जलता हुआ दिखता है। अभी तक तेल खुद बातीतक चला आता था। मेरे अनुसार यही भारत की संस्कृति और प्रगति के लिए सबसे घातक साबित हुआ। लेकिन संस्कृति के मायने हीबदल दिए गए हैं।  आध्यात्मिक यात्रा और उसके लिए अनुसंधान ताकि नए नए तरीक़े से आज और आने वाली पीढ़ी अपने मनुष्य होने की पराकाष्ठा को पासके। साधारण लोगों के जीवन में आज के जमाने अनुसार नए नए तरीक़े से ऐसे व्यावहारिक बदलाव जिनकी साधारण जीवन में भीज़रूरत हो और जो कोई कभी आध्यात्मिक यात्रा पर निकले तो उसे उसके दूसरे पहलू का भी पता चले और उसे अपने पुरखों पर गर्व होकि अनजाने हो वह कितनी महत्वपूर्ण ज्ञान से अपने जीवन में परिचित हो चुका था। इसे ही संस्कार कहते हैं। और संस्कृति को बचाने केलिए नित नए नए आध्यात्मिक प्रयोग करने होते हैं।  जनता मंदिर के हाथ में। मंदिर गुंडों के हाथ में। गुंडे नेताओं के हाथ में। और नेता धनपतियों के हाथ में। तब कैसी संस्कृति? और कैसासंस्कार? पश्चिम से जो लिया जा सकता है वह उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। उसको आध्यात्मिक अनुसंधान से जोड़ने पर ही विश्वगुरु होने कीसम्भावना है। ओशो ने अपने काम्यून द्वारा यह करके दिखा दिया लेकिन हम उसे अनदेखा करके बड़ी क़ीमत चुका रहे हैं। उसमेंसमयानुसर बदलाव कर अपनाना चाहिए। ओशो उपनिषद के माध्यम से पूरा मार्गदर्शन इसके बारे में दिया गया है कि कैसे उसे पूरे विश्वमें फैलाया जा सकता है।  जो हमारी धरोहर है, जिसके लिए पूरी दुनिया हमारे सामने नतमस्तक होती रही है, उसको छोड़कर हमने पश्चिम की तरह खान-पानइत्यादि को अपना लिया यही स्वधर्म को छोड़कर दूसरे का धर्म अपनाना है।  यह तो ऐसा है जैसे अमरीकाScience&technology को छोड़कर oil को अपनी जीविका का साधन बना ले।  लेकिन भारत की संस्कृति के नाम पर व्यवसाय के लिए समर्पित करके व्यक्ति खुद का कितना नुक़सान करता रहा है ( पीढ़ी दर पीढ़ी)इसपर ध्यान  देने की ज़रूरत है। ओशो के के बताए मार्ग पर एक एक कदम उठाकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, कई विदेशी लोग प्राप्त कर चुके हैं।  पहले जीवन मेंमैंने awareness/mindfulness meditation को सुबह दांत साफ़ करते समय करना प्रारम्भ किया और पारिवारिक ज़िम्मेदारी निभातारहा। संतों के प्रवचन भी सुनता रहा चाहे वह किसी भी धर्म के हों और अपने धर्म की किताब भी पढ़ता रहा । फिर जब भी लगा कि क़रीबक़रीब सारी जिम्मेदारियाँ पूरी हो चुकी है, क्योंकि पूरी तो कभी नहीं होतीं, तब अपने आपको पूरी तरह से इस अपनी खुद के प्रति ईश्वरद्वारा सौंपी गयी ज़िम्मेदारी के प्रति समर्पित कर दिया। ईश्वर की कृपा और गुरुओं के आशीर्वाद से ही यह सम्भव है क्योंकि कलियुग मेंसंसार में रहकर संसार से विलग होना ही सबसे बड़ी चुनौती है। बाक़ी आसान है, किसी ने meditation या ज्ञान मार्ग से पाया। मेरा दोस्तभक्ति मार्ग पर काफ़ी आगे आ चुका है।  आदमी जिसका निर्माण करता है, उसे वह नष्ट भी कर सकता है और पुनर्निर्माण भी कर सकता है। हम मस्जिद बनाने वाले भी हुए, तोड़नेवाले भी हुए और अब फिर ‘वहीं पर’ मंदिर भी बनाने जा रहे हैं। यह तो चलो अच्छा हुआ लेकिन अब हम खुद पर भी ध्यान दे लेंगे तोअच्छा रहेगा। तो जो अनपढ़ ब्राह्मण का निर्माण करके बैठा है, वही उस धारणा को नष्ट भी कर सकता है और ‘वहीं पर’ असलीब्राह्मणत्व को स्थापित करके मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं। यह सम्भव है। मेरा ब्लॉग philosia.in मेरे अनुभव को लिपिबद्ध किएहुएहैं।  यही असली घर वापसी होगी उसके लिए जो चुनौती को स्वीकार करेगा और  ब्रह्म ज्ञान से पहले और कम को स्वीकार नहीं करेगा।क्योंकि वही है हमारा असली घर, और उसी पर वापस लौटने का पूरे जी जान से प्रयत्न तो किया ही जा सकता है। वहीं से यात्रा शुरू हुईथी। मनुष्य उस  यात्रा के प्रथम और अंतिम छोर के जोड़ पर स्थित है, जो उस पूरी गोलाकार यात्रा का महत्वपूर्ण बिंदु है। उस प्रथम औरअंतिम बिंदु के जुड़ते ही मनुष्य उसकी परिधि से केंद्र पर ‘गिर जाता’ है, इसे ही गुरु की कृपा या ईश्वर की दया कहा जाता है क्योंकि यहहमारे करने से नहीं होता, ‘हमारे’ न करने से अपनेआप होता है। इसी अनिश्चितता के कारण सभी जो संसार मिका है उसे ही साधने लगतेहै, जैसा कि सभी कर रहे हैं। लेकिन यही माया की पकड़ है जो कोई साधता नहीं दिखता फिर भी उसी में सार नज़र आने लगता है।व्यक्ति अपनेआप को असहाय और कमजोर समझने लगता है क्योंकि ख्वाहिशें बड़ी बड़ी पाल लेता है या समाज के देखादेखी उसकोउनके बग़ैर जीवन व्यर्थ नज़र आने लगता है। इसे ही किसी सूफ़ी संत ने इस प्रकार कहा है: बुलंद (infinite) होकर भी आदमी, अपनी ख्वाहिशों का ग़ुलाम है। यह है मयक़दा, यहाँ रिंद हैं, यहाँ सबका साक़ी इमाम है॥ किसी को धन का नशा है, किसी को पद का तो किसी को सुंदरता का लेकिन सब नशे में हैं और उसपर तुर्रा यह कि खुद ईश्वर ने इनकोयह जाम पिला रखा है। लेकिन मनुष्य ईश्वर से बढ़कर है क्योंकि वह उसके इस नशे से मुक्त होकर अपनी बुलंदी को पाकर आपने घरवापस जा सकता है। और यही challenge है उसको ईश्वर का दिया हुआ, कि माया मेरी जाम मेरा और तुझ पर भरोसा और कृपा भीमेरी। तो किसपर भरोसा करे वही तेरे प्रारब्ध का कारण बनेगा।  उसपर यह तो तय है ही कि जहां तक यात्रा होगी अगले जन्म में वहीं से शुरू होगी। यही तो शुभ लाभ है, ब्राह्मणत्व की राह में कोई ख़ालीतो जाता ही नहीं। ‘कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं होता, ‘एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों’॥उ वाक़ई आप इस आसमान से बाहर हो जाते हैं, ब्रह्मज्ञान कुछ ऐसा ही अनुभव है और यह शेर उसी के लिए लिखा गया है। 

Why Mystics added Zero as a number in mathematics?

Why Mystics added Zero as a number in mathematics? Spiritual seekers arrived at it through meditation or mindfulness. Here I am trying to shed another perspective on it from philosophical or psychological point of view. Osho, Vivekananda and Vedant is used to support my conclusion.