There is no other.

a human being if one is just living in heard mentality by regurgitating what religion, society, education taught as one’s own knowledge about ‘self’ then that person cannot be hold in God’s arms. Only the one who dares to explore inner REALITY from one’s own experience could be.

पूरब के देशों में जन्मना या रहना क्यों होता है?

मैंने आध्यात्मिक यात्रा के लिए अपने दोस्तों साथियों और परिवार के लोगों से दूरियाँ बना लीं थीं। सिर्फ़ माता पिता और बच्चों की ज़िम्मेदारीयों को पूरे जिम्मेदारीपूर्ण तरीक़े से निर्वाह करता रहा। मैं आजकल अपने मित्रों तक यह संदेश पहुँचा रहा हूँ कि मैंने आध्यात्मिक यात्रा में एक छोटा सा मुक़ाम हासिल किया है, ताकि उनको उनके मेरी यात्रा में सहयोग का जो भी पुण्य मिला है उसका वे सही निवेश कर सकें।

घणा दिन सो लियो रे, अब तो जाग मुसाफ़िर जाग।

इस देश के आध्यात्मिक यात्रा पर किए अनुसंधान इतने गहरे गए हैं कि कहीं और इस जगत में उसकी बराबरी नहीं है। सत्य हमेशा नएनए रूप में जगत के सामने आता रहेगा यह उसका स्वभाव है। यदि जिनके ऊपर इसके अनुसंधान की ज़िम्मेदारी है वे जब जब भी अपनीज़िम्मेदारी से च्युत होंगे, सत्य अपने को प्रकट कहीं और से करने लगेगा।

It is spring after all!

You are the seed from which the tree of your ‘self’ is ready to evolve as soon as the seed is ready to sacrifice its outer cover (here the ego and desires are the outer cover of that seed) and then dare to jump into the unknown ie darkness (rooting in soil) and keep learning, unlearning and relearning by practicing meditation ie growth of roots. Then it is sure that one day the first glimpse of light becomes visible to its stem.

जो कर्ता में अकर्ता, और अकर्ता में कर्ता को देखता है। वही देखता है।भाग-२

आत्मा अकर्ता है, जब चलने की बात आये। और कर्ता है जब देखने की बात आए। और शरीर कर्ता है सांसारिक कार्य का, लेकिनअकर्ता है जब देखने की बात आए।  तो इस प्रकार शरीर हमारा स्वरूप नहीं है क्योंकि यह तो  मृत्यु के साथ ही ख़त्म हो जाएगा। हमारा स्वरूप आत्मा है, और आत्मा कोजानना ही अपनेआप को जानना है, और आत्मा को उसमें खोकर ही जाना जा सकता है तो आत्मा को जानना ही परमात्मा हो जाना भीहै।  तभी उदघोश निकलेगा अपनेआप से ‘अहं ब्रह्मस्मि’। वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है जिससे यह उदघोश अपने आप निकला हो।किसी के कहने से नहीं, किसी से सुनने से नहीं।  कबीर इसी को कह गए है:  कहा सुनी की है नहीं, देखा देखी की है बात।  आत्मा में dissolve हो जाना, खो जाना ही आत्मा को देखना है। काम के समय भी हम अपने आप में खो जाते हैं, वहाँ इसकी झलकहमको मिली ज़रूर है लेकिन तब काम का सहारा लेकर खोए थे। और जो सबका सहारा है उसे बेसहारा होकर ही जाना जा सकता है।  इसीलिए संगीतज्ञ भी ईश्वर के प्यासे रहते हैं। सहारे से एहसास होता है लेकिन डूब नहीं पाते। तिनके का भी सहारा है तो डूब नहींपाओगे। और उसे डूबकर पूरी तरह dissolve होकर ही जाना जा सकता है।  ऊपर से तुर्रा यह कीं समय बहुत काम है। कबीर ने कहा है: सागर में एक लहर उठी, फिर गिरकर सागर में हो मिल गयी। सिर्फ़ इसलिएकि उसका नाम ‘लहर’ है, क्या वह सागर नहीं रही? लेकिन खुद को लहर मानते ही सारा मायाजाल अपनेआप गुँथने लगता है। फिर उसमें भेद करना शुरू कर देता है mind जैसे कोई सुनामी लहर, ज्वार-भाटा लहर, छोटी लहर, नीची जाति की लहर, बनिया लहर, ब्राह्मण लहर, शूद्र लहर, क्षत्रिय लहर, Indian लहर, पाकिस्तानी लहर, मुसलमान लहर, … Continue reading जो कर्ता में अकर्ता, और अकर्ता में कर्ता को देखता है। वही देखता है।भाग-२

जो कर्ता में अकर्ता, और अकर्ता में कर्ता को देखता है। वही देखता है।

जो कर्ता में अकर्ता, और अकर्ता में कर्ता को देखता है। वही देखता है। गीता के एक श्लोक पर आधारित है यह. बचपन में अंधे और लंगड़े की पढ़ी कहानी को इसके माध्यम से आध्यात्मिक यात्रा के लिए उपयोगी बताने का प्रयास किया है ।

द्रोपदि का आधुनिक चीरहरण

पुराने जमाने में स्त्री को ज्ञान प्राप्ति नहीं हो सकती थी, लेकिन मीरा, राबिया, दयाबाई इत्यादि ने साबित कर दिया कि जीसस के ज्ञानप्राप्ति के बाद से धर्म की यात्रा में अब समाज का निम्न वर्ग और स्त्री दोनों ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, और कई कर भी चुके।

ऐसी भक्ति करे रैदासा।

रैदास की शिष्या, मीरा, के कृष्ण से मिलन की यात्रा को आज के परिदृश्य में बताने का प्रयत्न किया है। वह परमात्मा हमारा स्वरूप ही है, लेकिन यात्रा की भारी भरकम क़ीमत जो चुकाने को तैयार है उसे ही मिलता है। नाथद्वारा मैं आज भी मीरा का मंदिर है जो इस घटना का प्रमाण है। इसलिए उसे तोड़ा नहीं गया, पूरे मंदिर का पुनर्निर्माण कर दिया गया। वही उस मंदिर का केंद्र है।

हर शरीर में रामायण या महाभारत घट रही है प्रतिक्षण।

महाभारत मेरी नज़र से। मानव शरीर को मैंने पाँच पांडवों और कौरवों के घटनाक्रम का स्टेज पर नाटक के रूपांतरण के रूप में प्रस्तुत किया है। आध्यात्मिक दृष्टि से इस महाकाव्य की रचना क्यों की गयी होगी यह बताने का प्रयास किया है

You are God*

*T&C apply.  Terms and Conditions: You should not be searching for God, because God can remain present as a God or the seeker. Instead of searching keep practicing meditation, as little as possible or as much as possible as per situation that day. God is always here and now. You in present moment, without your past … Continue reading You are God*